छत्तीसगढ़ में ‘जच्चा-बच्चा’ की सुरक्षा को लेकर एक सुखद बात सामने आई है, लेकिन इसके साथ ही एक ऐसी चिंता भी जुड़ी है, जो स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में अब अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव यानी संस्थागत प्रसव का आंकड़ा बढ़कर 86.9 फीसदी हो गया है। शहरों में तो यह 94.6 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो यह दर्शाता है कि लोगों का सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली पर भरोसा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि निजी अस्पतालों में ऑपरेशन (सी-सेक्शन) से डिलीवरी का आंकड़ा 64.9% तक पहुंच गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘जरूरत से ज्यादा ऑपरेशन’ (ओवर-मेडिकलाइजेशन) की तरफ इशारा है, जो आम जनता की जेब पर तो बोझ डाल ही रहा है, साथ ही मां और बच्चे की सेहत के साथ भी खिलवाड़ है। देखभाल की रफ्तार धीमी पिछले दो सर्वेक्षणों में छत्तीसगढ़ ने 15.5% की शानदार छलांग लगाई थी, लेकिन इस बार रफ्तार कम हुई है। सर्वे-5 (85.7%) से सर्वे-6 (86.9%) के बीच की बढ़ोतरी महज 1.2 प्रतिशत अंकों तक सिमट गई है। अभी भी हमारा राज्य राष्ट्रीय औसत (90.6%) से 3.7% पीछे है। अलग इलाकों की तस्वीर अलग: प्रदेश के भीतर स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर दो अलग-अलग तस्वीरें दिखती हैं। एक ओर बालोद और दुर्ग जैसे जिलों में संस्थागत प्रसव 95% से अधिक है, तो वहीं बस्तर और बीजापुर जैसे आदिवासी बहुल अंचल आज भी 65% के आंकड़े को छूने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आगे की राह: रेड ब्लॉक प्लान : जिन जिलों में प्रसव दर 80% से कम है, वहां 6 महीने के लिए विशेष ‘स्पेशल टास्क फोर्स’ बनाकर काम करना होगा। {बर्थ प्रिपैयर्डनेस : हर गर्भवती महिला के कार्ड में प्रसव की संभावित तारीख के साथ वाहन का नंबर, ब्लड ग्रुप और नजदीकी अस्पताल का विवरण पहले से तय हो। {ऑपरेशन ऑडिट : निजी अस्पतालों में धड़ल्ले से हो रहे ऑपरेशन (सी-सेक्शन) की कड़ाई से जांच हो, ताकि अनावश्यक ऑपरेशन पर रोक लगे।
