एक 13 साल की एक लड़की… गांव का छोटा-सा मंच… चारों तरफ बैठे लोग… और हाथ में एक तंबूरा। जैसे ही उसने महाभारत की कथा शुरू की, पूरा माहौल बदल गया। कभी हाथ में पकड़ा तंबूरा भीम की गदा बन जाता, तो अगले ही पल अर्जुन का धनुष। उसकी आवाज में ऐसा दम था कि द्रौपदी का दर्द, भीम का क्रोध और कृष्ण की मुस्कान, सब एक-एक कर मंच पर उतर आते। उस दिन दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि सार्वजनिक मंच पर गाने की वजह से समाज से ठुकराई गई यही आदिवासी लड़की एक दिन छत्तीसगढ़ की पहचान बन जाएगी और दुनिया उसे पंडवानी की सबसे बड़ी आवाज के नाम से जानेगी। वो थीं तीजन बाई। गनियारी के एक साधारण पारधी परिवार से निकली वह लड़की, जिसने गरीबी देखी, भूख देखी, घर से निकाले जाने का दर्द सहा, रिश्तों के टूटने का दुख झेला, लेकिन हाथ से तंबूरा कभी नहीं छोड़ा। यही तंबूरा आगे चलकर उनकी पहचान बना और पंडवानी को गांव की चौपाल से निकालकर दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक मंचों तक पहुंचा दिया। रविवार (5 जुलाई) को 70 साल की उम्र में तीजन बाई ने अंतिम सांस ली। लेकिन उनके साथ सिर्फ एक कलाकार का सफर खत्म नहीं हुआ, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का एक ऐसा अध्याय इतिहास बन गया, जिसने महाभारत की कथाओं को सिर्फ सुनाया नहीं, बल्कि उन्हें अपनी आवाज, अभिनय और अद्भुत मंचीय प्रस्तुति से जिंदा कर दिया। आज भी जब पंडवानी का जिक्र होगा, सबसे पहले जिस चेहरे और जिस बुलंद आवाज की याद आएगी, वह तीजन बाई ही होंगी। आइए जानते हैं तीजन बाई की जिंदगी के कुछ ऐसे किस्से, जिन्होंने उन्हें गांव की एक साधारण लड़की से दुनिया में पंडवानी की सबसे बड़ी पहचान बना दिया। पहले ये तस्वीरें देखिए… 6 दिन की उम्र में कुत्ता उठा ले गया तीजन बाई के जीवन पर किताब ‘तीजनगाथा’ लिखने वाले लेखक धर्मेंद्र निर्मल बताते हैं कि ये उनकी जिंदगी का पहला संघर्ष था, जो जन्म के महज 6 दिन बाद ही शुरू हो गया था। मां सुखबती बच्ची को कपड़े में लपेटकर झोपड़ी के बाहर सुला गई थीं और खुद नहाने चली गईं। इतने में एक कुत्ता आया और नवजात को मुंह में दबाकर ले भागा। मां लौटीं तो बच्ची गायब थी। पूरे परिवार में हड़कंप मच गया। आसपास तलाश शुरू हुई। कुछ देर बाद झोपड़ी के पीछे वही कुत्ता बच्ची को कपड़े समेत दबाए बैठा मिला। किसी तरह रोटी डालकर उसे हटाया गया और बच्ची को सुरक्षित वापस ले लिया गया। शायद उसी दिन किस्मत ने तय कर दिया था कि यह बच्ची हर मुश्किल से लड़ना सीखेगी। क्योंकि इसके बाद भी जिंदगी ने उसे कभी आसान रास्ते नहीं दिए। 8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के पाटन ब्लॉक के अटारी गांव के एक साधारण पारधी परिवार में जन्मीं तीजन बाई का बचपन अभावों के बीच बीता। पिता छुनुकलाल पारधी शिकार करके परिवार चलाते थे, जबकि मां सुखबती चटाई, बुहारी और दूसरी चीजें बनाकर बेचती थीं। बाद में परिवार रोजी-रोटी की तलाश में दुर्ग रेलवे स्टेशन के पास आकर रहने लगा। हालात ऐसे थे कि कई बार छोटी-सी तीजन भूख मिटाने के लिए रेलवे स्टेशन पर भीख मांगने निकल जाती थीं। इसी दौरान डायरिया की महामारी में उनके भाई की मौत हो गई और खुद तीजन भी जिंदगी और मौत के बीच झूलती रहीं। लेकिन हर बार वह लौट आईं। शायद इसलिए कि उनके हिस्से में सिर्फ संघर्ष नहीं, इतिहास भी लिखा था। ‘फ्रॉक वाली तीजन’… बचपन की वही लड़की, जो बाद में पूरी दुनिया की हो गई साहित्यकार सुधा वर्मा जब भी तीजन बाई को याद करती हैं, तो उन्हें पद्म विभूषण या दुनिया भर में पंडवानी गाने वाली कलाकार नहीं, बल्कि फ्रॉक पहनकर मिट्टी में खेलती एक छोटी-सी लड़की याद आती है। वो बताती हैं कि मेरा मामा गांव महका है। भिलाई 3 के पास। हम लोग अक्सर छुट्टियों में महका गनियारी को पार करके जाते थे। वहां की डबरी को मेरे नानाजी ने बनवाया था। गांव जाते समय हम लोग वहां कभी-कभी उतर कर हाथ पैर धोते थे। हमारे मामाजी के परिवार को ये लोग अच्छे से जानते थे। हम दोनों की उम्र करीब बराबर है। तीजन वहां पर अपने घर के सामने खेलती रहती थी, उसके साथ दो तीन और बच्चे रहते थे। मुझे तो कोई मिल भर जाये, खेलना बात करना शुरू कर देती थी। मैं दौड़ते वहां चली जाती थी उसके साथ खेलती थी। वहां पर खुले में ये लोग चटाई बनाते थे और झाड़ू। मामा जी चटाई वहीं से ले जाते थे। अब उसका घर बहुत अंदर हो गया है। मैदान ही नहीं बचा है। मेरे लिये तीजन नाम अनोखा था, इस कारण ये मुझे याद रही। जब भी मामा जी आते थे तो तीजन की उन्नति के बारे में बताते थे। मेरी शादी हो गई तो एक बार गांव में ही नाचा रखे थे तब तीजन का एक घंटे का कार्यक्रम रखा था। क्योंकि मामा जी के गांव की थी। उसके बाद मैं विवेकानंद आश्रम में मिली। उसका कार्यक्रम था। वहां पहले एक महीने तक धार्मिक कार्यक्रम होते थे। उसकी पंडवानी दो घंटे तक चली। आत्मानंद जी सामने जमीन पर बैठ कर पूरा सुन रहे थे। जब वह मंच से उतरी तो हम लोग मंदिर के बाजू के कमरे के बाहर में मिले। वहां पर वह आत्मानंद भैय्या के साथ बैठी हुई थी। मां ने पूछा ‘चिन्हत हस तीजन? ‘वह देखती रही फिर नहीं में सिर हिला दी। स्वामी जी हंस रहे थे। मां ने कहा ’महका मोर मइके आये। जेठूलाल झुमुकलाल मोर भाई आये।’ वह तुरंत बोली, ‘रायपुर वाली फूफू अस का?’ पैर पड़ने झुकने लगी तो मां ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिए। मां ने पूछा ‘ये कोन आये?’ ‘हां मोर संगवारी बेबी आये।’ मेरे हाथ को पकड़ कर बोली ‘मोर असन संग खेले बर आवस बहिनी।’ मुझे घर में बेबी बोलते हैं तो बहुत लोग आज भी इसी नाम से जानते हैं। हम दोनों मुस्कुराते रहे। यही हमारी सालों बाद की प्यारी मुलाकात थी। उसके बाद एक बार और कार्यक्रम हुआ था। मैं कार्यक्रम देखकर वापस आ गई। जब बड़े दाऊ से मिलने झिझकती थी तीजन पहले हम लोग बड़े थे दाऊ थे इसलिए वह मिलने में झिझकती थी। पर अब वह बड़ी हो गई थी। मुझे उससे मिलने में अच्छा नहीं लग रहा था। मिलती तो हम लोग क्या बातें करते। बचपन के प्यार भरे संबंधों के बीच में समय के अंतराल का सन्नाटा था। बिना माइक… लालटेन की रोशनी में पहला शो चंदखुरी के समाजसेवी नरसिंह चंद्राकर बताते हैं कि तीजन बाई के पिता छींद के पेड़ों से झाड़ू और चटाई बनाने का सामान काटते थे। कई बार खेत मालिक उनका टंगिया और दूसरे औजार अपने पास रख लेते थे। एक बार ऐसा ही हुआ तो उनके पिता ने खेत मालिक से कहा, ‘मेरे औजार वापस कर दो, बदले में मेरी बेटी तुम्हें भजन सुनाएगी।’ रात को गांव में लालटेन (या चिमनी) की रोशनी में छोटा-सा आयोजन हुआ। पहली बार लोगों ने उस छोटी-सी बच्ची की आवाज सुनी। उसके भजन ने गांव वालों का ध्यान खींच लिया।धीरे-धीरे चंदखुरी में यह खबर फैल गई कि एक लड़की महाभारत की कथा सुनाती है और पंडवानी गाती है। इसके कुछ समय बाद गांव के करीब 25-30 घरों के लोग जुटे। तीजन बाई ने उन्हें लगातार 3 दिनों तक पंडवानी सुनाई। उनकी प्रस्तुति से गांव के उपसरपंच भूषणलाल हरमुख इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें 10 रुपये इनाम दिए। यही उनकी जिंदगी का पहला सम्मान था। तीजन बाई को बचपन से ही भजन-कीर्तन और महाभारत की कथाओं का गहरा शौक था। मौका मिलता तो कभी जयद्रथ वध का प्रसंग सुनातीं, तो कभी कोई भजन गाने लगतीं। उनका ननिहाल पाटन ब्लॉक में था। उनके नाना सिर्फ तंबूरे के सहारे पंडवानी गाते थे। छोटी-सी तीजन घंटों बैठकर उन्हें सुनतीं और फिर उनकी नकल करते हुए खुद भी पंडवानी गाने का अभ्यास करतीं। गांव की महिलाएं बताती हैं कि चंदखुरी में खेतों में काम करते हुए भी वह पंडवानी गुनगुनाती रहती थीं। उनकी इसी लगन को देखकर भूषणलाल हरमुख ने उन्हें सार्वजनिक मंच पर गाने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया। बाद में उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें विधिवत पंडवानी का प्रशिक्षण दिया। यहीं से तीजन बाई के उस सफर की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर उन्हें गांव की चौपाल से दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचा दिया। पंडवानी नहीं छोड़ी.. इसलिए घर टूटा, लेकिन हौसला नहीं उनकी जीवनी ‘तीजन गाथा’ लिखने वाले लेखक धर्मेंद्र निर्मल के मुताबिक, बचपन से ही उन्हें परिवार और समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। बचपन में ही उनकी शादी कर दी गई थी। करीब 12 साल की उम्र में जब गौना कराने ससुराल वाले आए, तो उन्होंने पंडवानी छोड़ने की शर्त रख दी। लेकिन तीजन बाई ने साफ इनकार कर दिया। इसी फैसले के बाद उनकी पहली शादी टूट गई। समाज ने भी उनका बहिष्कार कर दिया और उन्हें घर छोड़ना पड़ा। एक छोटी-सी झोपड़ी में अकेले रहकर, पड़ोसियों से बर्तन मांगकर खाना बनाते हुए भी उन्होंने पंडवानी नहीं छोड़ी। शुरुआत में उनके नाना ने गनियारी गांव में उन्हें छोटा-सा मंच दिया। बाद में पास के चंदखुरी के देशमुख परिवार ने गांव के चौक में पंडवानी सुनाने के लिए बुलाया। उनकी प्रस्तुति इतनी लोकप्रिय हुई कि कार्यक्रम 3 हफ्ते तक चलता रहा। आसपास के गांवों से लोग उन्हें सुनने आने लगे। तीजन नाम कैसे पड़ा? धर्मेंद्र निर्मल बताते हैं कि तीजन बाई की जन्मतिथि को लेकर अलग-अलग दावे हैं। कुछ लोग 24 अप्रैल बताते हैं, जबकि कई लोगों के अनुसार उनका जन्म 1956 में तीज पर्व के दिन हुआ था। इसी वजह से उनका नाम ‘तीजन’ रखा गया। तीजन बाई पारधी जनजाति से थीं। इस समुदाय का पारंपरिक पेशा शिकार करना, झाड़ू बनाना और बांस या दूसरे प्राकृतिक संसाधनों से घरेलू सामान तैयार करना रहा है। औपचारिक शिक्षा नहीं होने के बावजूद उन्होंने संस्कृत महाभारत के सभी 18 पर्व सिर्फ 21 दिनों में कंठस्थ कर लिए थे। करीब 17-18 साल की उम्र में उन्होंने दूसरी शादी की। इस विवाह से उनके तीन बेटे हुए। लेकिन यह रिश्ता भी सुखद नहीं रहा। उनके पति शराब पीकर मारपीट करते थे। एक बार तो पंडवानी की प्रस्तुति के दौरान ही उन्होंने मंच पर उनकी पिटाई कर दी। इसके बाद तीजन बाई ने उनसे अलग होने का फैसला कर लिया। बाद में उन्होंने हारमोनियम वादक तुकाराम वर्मा से विवाह किया। तुकाराम उनके कार्यक्रमों का प्रबंधन भी देखते थे और मंच पर उनके साथ संगत भी करते थे। तीजन बाई ने अपने तीनों बेटों की परवरिश खुद की। बाद में उनके दो बेटों का निधन हो गया। भोपाल में आखिरी मुलाकात… जब फाइव स्टार होटल में भी ढूंढ रही थीं बोरे-बासी दुनिया के बड़े-बड़े मंचों पर पंडवानी सुनाने वाली तीजन बाई जहां भी जातीं, वहां खूब सम्मान मिलता। लेकिन विदेश यात्राओं से लौटने के बाद पत्रकारों से उनकी एक शिकायत हमेशा रहती थी -‘सबले जियादा बोरे-बासी के याद आइस।” (सबसे ज्यादा बोरे-बासी की याद आई।) कहते हैं, मिट्टी से जुड़ा इंसान दुनिया घूम ले, लेकिन उसका स्वाद नहीं बदलता। तीजन बाई भी ऐसी ही थीं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े होमेंद्र देशमुख बताते हैं कि मई 2022 में भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उनसे आखिरी मुलाकात हुई थी। अगले दिन सुबह वह होटल के कमरे में उनसे मिलने पहुंचे। सामने एक अलग ही नजारा था। फाइव स्टार होटल का स्टाफ परेशान था, क्योंकि तीजन बाई नाश्ते में बोरे-बासी खाना चाहती थीं। कर्मचारियों को समझ ही नहीं आ रहा था कि सुबह-सुबह किसी को सादा चावल, पानी और नमक कैसे परोसा जाए। होमेंद्र देशमुख कहते हैं, ‘मैंने वेटर से कहा- एक प्लेट सादा चावल, एक कटोरी नमक और पीने का पानी ले आइए। बाकी तीजन बाई खुद कर लेंगी।’ बस फिर क्या था… कुछ ही देर में चावल, पानी और नमक उनके सामने था। तीजन बाई ने अपने अंदाज में बोरे-बासी तैयार किया और बड़े चाव से खाने लगीं। देशमुख कहते हैं कि सफर के दौरान यही उनका सबसे पसंदीदा नाश्ता होता था, कई बार तो यही उनका पूरा भोजन भी बन जाता था। इसलिए वह मजाक में कहते हैं कि तीजन बाई बोरे-बासी की सबसे बड़ी ब्रांड एंबेसेडर थीं। उस सुबह दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई। तय हुआ कि जल्द ही गनियारी जाकर उनकी जिंदगी के अनसुने किस्सों पर विस्तार से बातचीत रिकॉर्ड की जाएगी। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था। भोपाल से लौटने के कुछ ही समय बाद तीजन बाई की तबीयत बिगड़ गई और वह मुलाकात कभी नहीं हो सकी। आज जब तीजन बाई इस दुनिया से विदा हो चुकी हैं, तो होमेंद्र देशमुख को भोपाल की वही सुबह सबसे ज्यादा याद आती है। उनके लिए तीजन बाई सिर्फ पद्म विभूषण से सम्मानित कलाकार नहीं थीं, बल्कि दुनिया भर में सम्मान पाने के बाद भी बोरे-बासी, छत्तीसगढ़ी बोली और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने वाली एक सहज इंसान थीं। शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान भी थी। हबीब तनवीर ने पहचानी प्रतिभा… फिर दुनिया ने सुनी पंडवानी तीजन बाई की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब उनकी कला पर प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर की नजर पड़ी। उन्होंने तीजन बाई की प्रतिभा को पहचाना और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति देने की सिफारिश की। यही प्रस्तुति उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इसके बाद उनकी पहचान गांव और छत्तीसगढ़ की सीमाओं से निकलकर पूरे देश में बनने लगी। साल 1986 में उन्हें भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी मिली। यहां उनकी कला को नया मंच और नई उड़ान मिली। इसके बाद वह भारत की सांस्कृतिक दूत बनकर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, तुर्की, ट्यूनीशिया समेत 15 से ज्यादा देशों तक पंडवानी की गूंज पहुंचाई। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिन देशों के लोग छत्तीसगढ़ी भाषा का एक शब्द भी नहीं समझते थे, वे भी उनके अभिनय, आवाज और कहानी कहने के अंदाज से मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनकी लोकप्रियता सिर्फ मंचों तक सीमित नहीं रही। प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल ने उन्हें अपने चर्चित टीवी धारावाहिक भारत एक खोज में भी जगह दी। इस धारावाहिक के जरिए देशभर के लाखों दर्शकों ने पहली बार पंडवानी को इतने करीब से देखा। इतनी बड़ी पहचान और सम्मान मिलने के बाद भी तीजन बाई की सादगी कभी नहीं बदली। पान की गिलौरी, छत्तीसगढ़ी बोली और गांव का अपनापन उनकी पहचान बना रहा। मंच से उतरने के बाद वह नए कलाकारों को पंडवानी सिखाने में भी उतनी ही रुचि लेती थीं। उनकी सबसे पसंदीदा प्रस्तुतियों में द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग शामिल था। इस कथा के जरिए वह सिर्फ महाभारत नहीं सुनाती थीं, बल्कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अन्याय पर समाज को सोचने का संदेश भी देती थीं। भारतीय लोककला को नई पहचान दिलाने के उनके योगदान के लिए कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि दी। उन्हें पद्मश्री (1987), पद्मभूषण (2003), पद्मविभूषण (2019), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। गांव की चौपाल से शुरू हुआ उनका सफर आखिरकार दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक मंचों तक पहुंचा और तीजन बाई पंडवानी की सबसे बुलंद आवाज बन गईं। ……………… इससे जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… पंडवानी को अमर कर गईं तीजन बाई:70 साल की उम्र में एम्स में अंतिम सांस ली, पैतृक गांव गनियारी में राजकीय सम्मान से अंतिम विदाई महाभारत की गूंज आज मौन हो गई। तंबूरे की वह थाप थम गई, जिसने दशकों तक भीष्म की प्रतिज्ञा, अर्जुन के गांडीव, द्रौपदी की पीड़ा और कृष्ण के संदेश को अपनी ओजस्वी वाणी(आवाज) में जीवंत किया था। छत्तीसगढ़ की लोक आत्मा और पंडवानी की अप्रतिम साधिका, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब इस संसार में नहीं रहीं। रविवार तड़के करीब 3.15 बजे रायपुर एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं। पढ़ें पूरी खबर…
