सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा परिवार में एक गृहिणी के लिए होममेकर के बजाय नेशन बिल्डर शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। एक गृहिणी का काम केवल खाना बनाना, बच्चों की देखभाल और घर संभालना नहीं है। वह परिवार की नींव को मजबूत बनाती है, अगली पीढ़ी तैयार करती है। समाज के विकास में उसका योगदान अहम है, लेकिन उसे गिना नहीं जाता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने एक दुर्घटना में पत्नी की मौत के बाद उसके पति को अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश देते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट नेकहा कि एक गृहिणी के घर के काम की वैल्यू निकाली जाए तो उसकी अनुमानित आय 30 हजार रुपए प्रतिमाह बनती है। इसलिए मुआवजा तय करते समय उनके योगदान को केवल सांकेतिक या कम करके नहीं आंका जा सकता। इस टिप्पणी और फैसले के मायने क्या… सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यदि किसी सड़क दुर्घटना में गृहिणी घायल हो जाती है या उसकी मौत हो जाती है, तो परिवार को केवल उसकी आय न होने के आधार पर कम मुआवजा नहीं दिया जा सकता। यानी सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम (एमवी एक्ट) के तहत दावों में पत्नी की घरेलू देखभाल के नुकसान को मुआवजे के एक अलग मद के रूप में मान्यता दे दी। बेंच ने मुआवजा तय करने के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए। अदालत ने कहा कि गृहिणियों की आय का आकलन करते समय उनकी उम्र, एजुकेशन, स्किल, पारवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक हालात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के 2024 में दिए गए एक फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाया। यह मामला 2001 में दो जीपों के बीच हुई सड़क दुर्घटना से जुड़ा था, जिसमें एक महिला की मौत हो गई थी। हाईकोर्ट ने पीड़ित के परिवार, जिसमें उसके पति और तीन बच्चे शामिल थे, को 8 लाख रुपए से ज्यादा का मुआवजा देने का आदेश दिया था। बेंच ने जिस प्रणय सेठी के केस का जिक्र किया, उसके बारे में जानिए प्रणय सेठी मामला मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून का एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला है, जिसे सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच ने 2017 में दिया था। मामला यह था कि सड़क दुर्घटनाओं में मौत होने पर मुआवजा तय करते समय अलग-अलग अदालतें अलग-अलग तरीके अपना रही थीं। इस वजह से एक जैसे हालात में भी मुआवजे की राशि में बड़ा अंतर आ जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद यह सिद्धांत तय किया था कि सड़क दुर्घटना में मौत होने पर मुआवजा तय करते समय मरने वाले की वर्तमान आय ही नहीं, बल्कि भविष्य में आय बढ़ने की संभावना को भी शामिल किया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि अंतिम संस्कार, संपत्ति की हानि और जीवनसाथी के साथ संबंधों की हानि जैसी मदों के लिए एक समान और तय मानक अपनाए जाएं, ताकि देशभर में मुआवजा देने का तरीका एक जैसा और न्यायसंगत रहे, ताकि एक जैसे हालात होने पर अलग-अलग अदालतें, अलग-अलग मुआवजा न दें। —————————- ये खबर भी पढ़ें… दहेज केस में कहा- बेटी को बचाने की गुहार लगाने वाले को भिखारी कह रहे; सुप्रीम कोर्ट बोला-बहू और उसके परिवार का अपमान बंद करें दहेज प्रताड़ना के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘आखिर लड़के शादी क्यों करते हैं, अगर उन्हें बाद में लड़की और उसके परिवार का अपमान ही करना है। समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि बहू और उसके परिवार का अपमान करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ पढ़ें पूरी खबर…
