कभी पथरीली और बंजर जमीन पर पारंपरिक खेती के भरोसे बमुश्किल गुजारा करने वाले बलरामपुर जिले के शंकरगढ़ क्षेत्र के किसान परिवारों के जीवन में अब बदलाव आ चुका है। जो जमीन कभी सूनी पड़ी रहती थी, आज वहां 1000 एकड़ क्षेत्र में आम और नाशपाती के बगीचे लहलहा रहे हैं। बंपर पैदावार ने इस इलाके को नाशपाती के एक बड़े हब के रूप में स्थापित कर दिया है, जिससे क्षेत्र के करीब एक हजार से अधिक किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है। आलम यह है कि कई किसान परिवारों ने फल बेचकर अपनी कमाई से ट्रैक्टर और पिकअप जैसे वाहन तक खरीद लिए हैं। इसकी शुरुआत साल 2013-14 में हुई थी, जब रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट सोसाइटी संस्था ने स्थानीय किसानों को फलदार पौधों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के सहयोग से क्षेत्र में वाड़ी विकास कार्यक्रम की नींव रखी गई। शुरुआत में किसानों के मन में थोड़ी झिझक और संशय था, लेकिन साल 2018-19 से जब पौधों में फल आने शुरू हुए, तो किसानों की मेहनत रंग लाने लगी। वर्तमान में ग्राम देवसारा, लारंगी, भगवतपुर, भुवनेश्वरपुर और जारहाडीह में नाशपाती की बड़े पैमाने पर तोड़ाई और बिक्री का काम जारी है। शंकरगढ़ के किसान अब स्मार्ट फार्मिंग की ओर कदम बढ़ा चुके हैं। वे केवल फलों की खेती पर ही निर्भर नहीं हैं, बल्कि आम और नाशपाती के पेड़ों के बीच खाली बची जमीन का भी बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। यह अतिरिक्त कमाई उनके दैनिक घरेलू खर्चों और मुख्य खेती की लागत निकालने में मददगार साबित हो रही है। प्रति एकड़ आम और नाशपाती के उत्पादन से आज हर किसान को सालाना 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक की शुद्ध आमदनी हो रही है।
