पाकिस्तान ने चीन में निर्मित अपनी नई हैंगोर क्लास पनडुब्बी को शामिल किया है। 1971 के युद्ध और बांग्लादेश के बनने के बाद से यह पहली बार है जब पाकिस्तान बंगाल की खाड़ी में अपनी नौसैनिक उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है। चीन के साथ पनडुब्बी सौदे पर हस्ताक्षर करने के एक दशक से ज्यादा समय बाद पाकिस्तान को पहली पनडुब्बी मिली है। यह सौदा पाकिस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा अधिग्रहण माना जाता है। अप्रैल 2015 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान पाकिस्तान और चीन के बीच 8 हैंगोर-क्लास पनडुब्बियों की खरीद का समझौता हुआ था। समझौते के अनुसार, इनमें से 4 पनडुब्बियां चीन में बननी थीं और 2022-23 तक पाकिस्तान को सौंप दी जानी थीं। बाकी 4 पनडुब्बियों को कराची शिपयार्ड एंड इंजीनियरिंग वर्क्स (KSEW) में 2028 तक असेंबल किया जाना था। हालांकि, 2026 तक पाकिस्तान नौसेना में सिर्फ एक पनडुब्बी ही शामिल हो पाई है। चीन में बनने वाली बाकी तीन पनडुब्बियां- पीएनएस गाजी (PNS Ghazi), पीएनएस शुशुक (PNS Shushuk) और पीएनएस मंग्रो (PNS Mangro) लॉन्च हो चुकी हैं और फिलहाल समुद्री परीक्षण (सी ट्रायल) से गुजर रही हैं। यानी चीन में बनी पहली चार पनडुब्बियों को तय समय सीमा तक पाकिस्तान को सौंपने का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। अब अनुमान लगाया जा रहा है कि सभी 8 पनडुब्बियां 2028 से 2030 के बीच पाकिस्तान को मिलेंगी। पनडुब्बी निर्माण के लिए कराची शिपयार्ड में बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है। इसके तहत नया शिप लिफ्ट और ट्रांसफर सिस्टम भी लगाया गया है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि किसी नई पनडुब्बी श्रेणी का निर्माण बेहद जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया होती है। पाकिस्तान इससे पहले अगोस्ता 90बी (Agosta 90B) श्रेणी की पनडुब्बी PNS Hamza का निर्माण कर चुका है, जिसे 2008 में नौसेना में शामिल किया गया था। लेकिन हैंगोर-क्लास परियोजना आकार, लागत और तकनीक तीनों मामलों में उससे कहीं बड़ी है। हैंगोर-क्लास पनडुब्बी कार्यक्रम की अनुमानित लागत 4 से 5 अरब डॉलर (करीब 34 से 43 हजार करोड़ रुपए) है। यही वजह है कि इसे पाकिस्तान के इतिहास का सबसे महंगा नौसैनिक कार्यक्रम माना जाता है।
