छत्तीसगढ़ के एक साधारण परिवार में जन्मे दिनेश राजपूत ने कभी सरकारी नौकरी कर परिवार की जिम्मेदारी संभालने का सपना देखा था। मां के निधन के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया और उन्होंने वैराग्य का मार्ग चुन लिया। दीक्षा लेने के बाद वे दौलतगिरी महाराज बने और पिछले पांच साल की खड़ी तपस्या के कठिन संकल्प में जुटे हैं। वह पिछले तीन साल से हरियाणा के पानीपत जिले के कवि गांव स्थित शिव मंदिर में रहकर वे बिना बैठे और बिना लेटे साधना कर रहे हैं। चार साल से ज्यादा समय तक खड़े रहने के कारण उनके पैर बुरी तरह सूजकर काले पड़ गए हैं। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो वायरल होने के बाद लोग उनकी तपस्या और जीवन यात्रा को लेकर चर्चा कर रहे हैं। दैनिक भास्कर की इस रिपोर्ट में पढ़िए दिनेश राजपूत से दौलतगिरी महाराज बनने तक का सफर और उनकी पांच साल की खड़ी तपस्या की पूरी कहानी। दिनेश राजपूत से दौलतगिरी महाराज बनने का सफर छत्तीसगढ़ में जन्म हुआ, पढ़ाई में होशियार थे 50 वर्षीय दौलतगिरी महाराज का असली नाम दिनेश राजपूत है। उनका जन्म छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के बैकुलपुर गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय डाक विभाग में कार्यरत थे और एक हाथ से दिव्यांग थे। दिनेश पढ़ाई में होनहार थे और बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारियां समझते थे। उनका लक्ष्य पढ़ाई पूरी कर सरकारी नौकरी हासिल करना था, ताकि पिता के रिटायर होने के बाद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभाल सकें। साल 1999: मां की बीमारी के कारण छूटी पढ़ाई साल 1999 में दिनेश राजपूत बी.कॉम सेकेंड ईयर के छात्र थे। उन्होंने सेकेंड ईयर की परीक्षा दी, लेकिन इसके बाद पढ़ाई जारी नहीं रख सके। इसी दौरान उनकी मां गंभीर रूप से बीमार हो गईं। उन्हें अस्पताल के ICU में भर्ती कराया गया, जहां करीब 8 महीने तक उनका इलाज चला। दिनेश और परिवार के अन्य सदस्य लगातार उनकी देखभाल करते रहे, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मां का निधन हो गया। मां की बीमारी और निधन के कारण दिनेश की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। मां के निधन के बाद वैराग्य की ओर रुझान दौलतगिरी महाराज बताते हैं कि मां के निधन का जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उस समय उनकी उम्र करीब 20-21 वर्ष थी। लंबे समय तक मां के इलाज और फिर उनके निधन के बाद जीवन और मृत्यु से जुड़े सवालों पर विचार करने लगे। इस घटना के बाद उनका मन पढ़ाई, नौकरी और सामान्य गृहस्थ जीवन से हटने लगा। धीरे-धीरे उनका रुझान आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ा और उन्होंने साधु मार्ग अपनाने का निर्णय लिया। घर छोड़कर साधु जीवन की शुरुआत उन्होंने बताया- मां के निधन के कुछ समय बाद घर छोड़ दिया। वे अपने गांव बैकुलपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित एक शिव मंदिर में रहने लगे, जहां अक्सर साधु-संतों का आना-जाना रहता था। वहां उन्होंने साधुओं की सेवा की और उनके सानिध्य में समय बिताया। इस दौरान वे अध्यात्म और धार्मिक ग्रंथों से जुड़ी बातें सुनते और सीखते रहे। बाद में उन्होंने दीक्षा ग्रहण की, जिसके बाद उनका नाम दौलतगिरी महाराज रखा गया। यहीं से उनके साधु जीवन की शुरुआत हुई। परिवार से संबंध टूटे, साधु जीवन पर अडिग रहे महाराज ने बताया कि घर छोड़कर साधु जीवन अपनाने के बाद परिवार ने वापस लाने की कोशिश की। उनके पिता, भाई और बहन उनसे मिलने पहुंचे और घर लौटने का आग्रह किया। परिवार चाहता था कि वे पढ़ाई पूरी करें, नौकरी करें और सामान्य जीवन जिएं। हालांकि, वह अपने फैसले पर कायम रहे और वापस घर नहीं लौटे। परिवार को जब यह स्पष्ट हो गया कि वे साधु जीवन नहीं छोड़ेंगे, तो सामाजिक और धार्मिक परंपराओं के तहत उनसे संबंध समाप्त कर दिए। परिवार ने उनका जीवित रहते पिंडदान भी कर दिया। 5 साल की खड़ी तपस्या का संकल्प लिया उन्होंने बताया कि साधु जीवन अपनाने के बाद 5 साल की खड़ी तपस्या का संकल्प लिया। इस तपस्या में साधक को लंबे समय तक खड़े रहकर ही साधना करनी होती है। तपस्या के दौरान वे बैठने या लेटने से परहेज करते थे और विश्राम के लिए विशेष सहारे का उपयोग करते थे। दैनिक जीवन की गतिविधियां, जैसे पूजा-पाठ, भोजन और अन्य आवश्यक कार्य भी इसी तपस्या के नियमों के अनुसार किए जाते हैं। इस साधना की शुरुआत छत्तीसगढ़ से की और तपस्या के दौरान विभिन्न स्थानों पर रहकर अपनी साधना जारी रखी। इस दौरान पैर सूझने लगे और पस भी निकलनी शुरू हुई। डॉक्टरों ने चेकअप के बाद ज्यादा देर खड़े न रहने को कहा। पानीपत के कवि गांव में आकर तपस्या करने लगे उन्होंने बताया कि वह पहले भी अपने गुरुओं के साथ कई बार पानीपत आ चुके थे। उन्हें पानीपत के कवि गांव का वातावरण पसंद आया, जिसके बाद वे करीब तीन साल पहले यहां स्थित शिव मंदिर में आकर रहने लगे। तब से वे इसी मंदिर परिसर में रहकर अपनी खड़ी तपस्या जारी रखे हुए हैं। पांच वर्षीय संकल्प आगामी 2 अप्रैल को पूरा होने जा रहा है। संकल्प की पूर्णता को लेकर शिव मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारियां चल रही हैं और श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि महाराज की साधना के कारण मंदिर में श्रद्धालुओं का आना बढ़ा है और गांव की पहचान भी व्यापक स्तर पर बनी है।
