फ्रेंडशिप-डे, रायपुर के अमर-अकबर और एंथोनी के किस्से:अंजुम-विनीता 42 साल से दोस्त, छत्तीसगढ़ बनाने के लिए धरना देने वाले दोस्तों से भी मिलिए

आज फ्रेंडशिप डे है। हर किसी की जिंदगी में कुछ ऐसे दोस्त होते हैं, जो समय के साथ परिवार का हिस्सा बन जाते हैं। उम्र बढ़ती है, जिम्मेदारियां बदलती हैं, लेकिन सच्ची दोस्ती का रिश्ता नहीं बदलता। इस खास मौके पर हम आपको रायपुर के कुछ ऐसे दोस्तों के ग्रुप्स की कहानी बता रहे हैं, जिनकी दोस्ती सालों से कायम है और आज भी लोगों के लिए मिसाल बनी हुई है। रायपुर की ऐसी तिकड़ी, जो पिछले 52 साल से साथ हैं। अलग-अलग धर्म और अलग-अलग कैरियर के रास्तों पर चलने के बावजूद इनकी दोस्ती हमेशा मजबूत रही। शहर में लोग इन्हें ‘अमर, अकबर और एंथोनी’ की तिकड़ी के नाम से जानते हैं। समय बदलता गया, लोग बदलते गए, लेकिन इन 3 दोस्तों की दोस्ती नहीं बदली, बल्कि अब उनके परिवारों और बच्चों तक भी पहुंच चुकी है। वहीं, अंजुम रहमान और विनीता जौहरी की दोस्ती भी करीब 42 साल पुरानी है। उनका मानना है कि, ऑनलाइन नहीं, बल्कि आमने-सामने मिलकर दोस्ती निभानी चाहिए। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन में 3 दोस्त धरने पर साथ बैठ गए थे। आइए जानते हैं इनकी दोस्ती के किस्से… देखिए पहले ये तस्वीरें- पहली कहानी: अमर, अकबर और एंथोनी तीनों हुए सक्सेस मोहन सैमुअल और राजीव शर्मा की दोस्ती बचपन में छोटापारा की डागा बिल्डिंग में साथ खेलते हुए शुरू हुई थी। बाद में स्कूल के दिनों में राजीव शर्मा की दोस्ती रिजवान अली से हुई और फिर तीनों हमेशा के लिए साथ हो गए। पढ़ाई, खेल और युवावस्था के दिनों में शायद ही कोई दिन ऐसा होता था, जब ये तीनों न मिलते हो। राजीव शर्मा ने हॉकी, बास्केटबॉल और बॉडी बिल्डिंग में नाम कमाया। रिजवान अली कुंग-फू में ब्लैक बेल्ट बने, जबकि मोहन सैमुअल ने फुटबॉल और क्रिकेट में विश्वविद्यालय स्तर तक खेला। नौकरी और कारोबार की व्यस्तता के बाद भी उनकी दोस्ती और मुलाकात का सिलसिला नहीं टूटा। इन 52 सालों में तीनों ने अपने-अपने क्षेत्र में अच्छी पहचान बनाई। राजीव शर्मा एडिशनल एसपी के पद से रिटायर्ड हुए, मोहन सैमुअल सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से डिप्टी जनरल मैनेजर के पद से रिटायर हुए। जबकि रिजवान अली आज भी अपने कारोबार में सक्रिय हैं। तीनों का कहना है कि अलग-अलग धर्म में जन्म लेने के बावजूद उनकी दोस्ती के बीच कभी धर्म नहीं आया। वे आज भी एक-दूसरे के परिवार के साथ हर त्योहार मिलकर मनाते हैं। फ्रेंडशिप डे पर इन तीनों की कहानी बताती है कि सच्ची दोस्ती धर्म, समय और दूरी से भी बड़ी होती है। दूसरी कहानी: हॉस्टल के दिनों का किस्सा आज भी याद अंजुम रहमान और विनीता जौहरी की दोस्ती करीब 42 साल पुरानी है। दोनों की मुलाकात स्कूल में हुई, तभी से यह रिश्ता आज तक बरकरार है। अंजुम आज एक स्कूल में प्रिंसिपल हैं। दोनों के परिवारों के बीच भी इतना अपनापन है कि एक-दूसरे के घर आना-जाना और साथ समय बिताना हमेशा से सामान्य बात रही है। अंजुम बताती हैं कि विनीता की वजह से उन्हें होली, दिवाली जैसे त्योहारों को करीब से जानने और मनाने का मौका मिला। वहीं, विनीता को अंजुम के घर ईद पर बनने वाली सेवइयां आज भी बेहद पसंद हैं। स्कूल और हॉस्टल के दिनों की यादें आज भी दोनों के चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं। अंजुम बताती हैं कि वह स्कूल टाइम से ही खेलों में एक्टिव थीं, इसलिए उन्हें ज्यादा प्रोटीन वाली डाइट की जरूरत होती थी। ऐसे में हॉस्टल के किचन में विनीता स्टाफ का ध्यान दूसरी तरफ कर देती थीं और अंजुम चुपके से अपने लिए एक-दो एक्स्ट्रा अंडे निकाल लेती थीं। यह देखकर किचन स्टाफ भी हंस पड़ता था। आज भी दोनों उस किस्से को याद कर खूब हंसती हैं। ऑनलाइन नहीं, आमने-सामने मिलकर निभाएं दोस्ती दोनों का मानना है कि पहले दोस्ती निभाने का तरीका अलग था। उस समय न मोबाइल था और न सोशल मीडिया। बात करनी होती थी तो एक-दूसरे के घर जाना पड़ता था। इसी वजह से रिश्तों में अपनापन और भरोसा ज्यादा था। अंजुम और विनीता का कहना है कि नई पीढ़ी को भी सोशल मीडिया से आगे बढ़कर दोस्तों के साथ समय बिताना चाहिए, क्योंकि मजबूत दोस्ती आमने-सामने मिलने और साथ रहने से ही बनती है। तीसरी कहानी: छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन में धरने पर साथ बैठे 3 दोस्त मनमोहन सिंह सैलानी, प्रेम शंकर गोटियाजी और शफीक अहमद की दोस्ती को 40 साल से ज्यादा हो चुके हैं। मनमोहन सिंह बताते हैं कि वह लुधियाना से रायपुर आए थे। यहीं उनकी मुलाकात प्रेम शंकर और शफीक से हुई और धीरे-धीरे यह मुलाकात गहरी दोस्ती में बदल गई। इन चार दशकों में तीनों ने जिंदगी के हर अच्छे-बुरे दौर में एक-दूसरे का साथ निभाया। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान भी इनकी दोस्ती की मिसाल देखने को मिली। तीनों साथ में धरना और प्रदर्शन में शामिल होते थे। आंदोलन के दिनों में एक दोस्त सुबह सभी के लिए नाश्ता लेकर आता था, तो दूसरे दोस्त के घर से शाम का खाना पहुंच जाता था। नगर घड़ी चौक पर लंबे समय तक चले धरने में तीनों हर दिन साथ बैठे। उनके लिए आंदोलन सिर्फ एक उद्देश्य नहीं था, बल्कि दोस्ती निभाने का भी एक मौका था। स्वार्थ नहीं, भरोसे का नाम है सच्ची दोस्ती प्रेम शंकर गोटियाजी कहते हैं कि अपने मतलब के लिए बनाया गया रिश्ता दोस्ती नहीं, बल्कि स्वार्थ होता है। सच्चा दोस्त वही है, जो अपने दोस्त की भलाई के बारे में पहले सोचे और मुश्किल समय में उसके साथ खड़ा रहे। वहीं, शफीक अहमद कहते हैं कि अलग-अलग धर्म से होने के बावजूद तीनों ने हमेशा एक-दूसरे की आस्था का सम्मान किया। यही वजह है कि आज उनके परिवार और बच्चे भी एक-दूसरे के बेहद करीब हैं। ईमानदारी और भरोसे की मिसाल प्रेम शंकर गोटियाजी ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हुए कहा कि उनके माता-पिता अक्सर कहा करते थे, ‘जिसका दोस्त सरदार है, वह असरदार है।’ उनके मुताबिक, यह कहावत उस दौर में सरदार समुदाय के प्रति लोगों के गहरे भरोसे और उनकी ईमानदार छवि को दर्शाती थी। उन्होंने बताया कि एक बार वे अपनी भाभी को रेलवे स्टेशन छोड़ने गए थे। उस समय उनके पिता ने कहा था, ‘जहां कोई सरदार बैठा हो, वहीं भाभी को बैठा देना।’ प्रेम शंकर के अनुसार, यह उस समय सरदार समुदाय के प्रति लोगों के अटूट विश्वास और उनकी विश्वसनीय पहचान का प्रतीक था। कृष्ण-सुदामा की दोस्ती बनी मिसाल भारत में दोस्ती की कई कहानियां प्रचलित हैं, लेकिन जब मिसाल देने की बात आती है तो सभी कृष्ण-सुदामा की दोस्ती को ही याद करते हैं। इनकी दोस्ती में त्याग, ईमानदारी और सम्मान का भाव है। यही एक सच्चे मित्र की पहचान है। जीवन में माता-पिता और गुरू के बाद दोस्त को ही विशेष स्थान दिया गया है। कृष्ण अपने दोस्त सुदामा से ऋषि संदीपन के आश्रम में मिले थे। कृष्ण एक राजपरिवार से थे और गरीब सुदामा ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। शिक्षा-दीक्षा पूरी होने के बाद भगवान कृष्ण राजा बन गए। वहीं सुदामा बुरे दौर से गुजर रहे थे। पत्नी की जिद मानकर सुदामा अपने बाल सखा कृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे। सुदामा से मिलने की खुशी में कृष्ण नंगे पैर ही उन्हें लेने के लिए दौड़ पड़े। उनकी दयनीय हालत देखकर भगवान कृष्ण के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। यह बताता है कि कृष्ण अपने मित्र से कितना प्यार करते थे। इसलिए दोनों की मित्रता का गुणगान पूरी दुनिया करती है। कैसे हुई फ्रेंडशिप डे की शुरुआत फ्रेंडशिप-डे हर किसी के लिए खास दिन है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन की शुरुआत कैसे हुई थी। सबसे पहले इस दिन की शुरुआत 1930 में पराग्वे में हुई। अमेरिकन बिजनेसमेन और हॉलमार्क कार्ड्स के फाउंडर जॉयस हॉल ने इसका प्रस्ताव रखा। आइडिया ये था कि पूरी दुनिया में एक दिन दोस्ती को समर्पित हो, हालांकि थी तो ये एक बिजनेस स्ट्रेटजी थी, लेकिन जल्द ही यह दिन पूरी दुनिया में पॉपुलर हो गया। 1998 में यूनाइटेड नेशंस ने विन्नी द पू को फ्रेंडशिप डे का ब्रांड एंबेसडर बनाया। प्रसिद्ध कॉमिक सीरीज का वो भालू, जो क्रिस्टोफर रॉबिन का बेस्ट फ्रेंड था।

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