जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में आतंकियों ने छत्तीसगढ़ के 2 मजदूरों की गोली मारकर हत्या कर दी। इस हमले में जान गंवाने वाले भूपेंद्र भैना (28) बिलाईगढ़ का रहने वाले थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। गांव में मजदूरी की तुलना में 3 गुना तक ज्यादा कमाई की उम्मीद में वह पत्नी के साथ जम्मू-कश्मीर के ईंट-भट्ठे पर काम करने गए थे। वहां एक हजार ईंट बनाने पर भूपेंद्र को 980 रुपए मिलते थे। परिवार की आर्थिक हालत इतनी खराब थी कि भूपेंद्र के पिता दशरथ ने अपना एक एकड़ खेत सिर्फ 30 हजार रुपए में गिरवी रख दिया। गांव में उस खेत की कीमत करीब 10 लाख रुपए बताई जाती है। इसके बाद दशरथ भी काम की तलाश में हिमाचल प्रदेश चले गए, जबकि भूपेंद्र अपनी पत्नी के साथ जम्मू-कश्मीर में मजदूरी करने गया था। दैनिक भास्कर की टीम भूपेंद्र के गांव छुईया पहुंची तो लोगों में गुस्सा था। उन्होंने कहा कि यहां रोजगार होता तो भूपेंद्र अपनी जान नहीं गंवाता। पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट… पहले देखिए ये तस्वीरें- मुख्य सड़क से करीब डेढ़ किलोमीटर खेतों के बीच बनी कच्ची सड़क पार करने के बाद छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले का आदिवासी बहुल गांव छुईहा शुरू होता है। गांव की पुरानी बस्ती का सबसे आखिरी घर भूपेंद्र भैना का है। घर के बाहर रिश्तेदारों, ग्रामीणों और प्रशासन के अधिकारियों की भीड़ है, घरों के बाहर बैठे लोग हर आने वाली गाड़ी को देख रहे हैं। किसी की आंखें नम हैं, तो कोई चुपचाप सड़क की ओर देख रहा है। कुलगाम में आतंकियों के हमले ने पूरे छुईहा गांव को गहरे शोक में डुबो दिया है। गांव में हर कोई इसी घटना पर चर्चा कर रहा था। गांव का एक बेटा, जो रोटी कमाने हजारों किलोमीटर दूर गया था, अब कभी वापस नहीं आएगा। 3 साल का बेटा…भाई ने बहन को कहा था राखी पर जरूर आऊंगा घर के आंगन में 3 साल का मानस खेल रहा था। कभी वह लोगों की भीड़ में चला जाता, कभी रस्सी पकड़कर दौड़ने लगता। प्रशासन ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए घर के बाहर एक रस्सी बांध रखी थी। वही रस्सी उसके लिए खेल बन गई थी। उसे यह नहीं पता था कि जिसके कंधों पर बैठकर वह खेलता था, वह पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। घर में मौजूद हर व्यक्ति की नजर जब भी उस मासूम पर पड़ती, आंखें भर आतीं। घर की चौखट में खड़ी बहन की नजरें बार-बार उसी रास्ते पर टिक जाती हैं, जहां से उसे भाई के पार्थिव शरीर के आने की उम्मीद थी। लेकिन कुछ देर बाद खबर मिलती है कि जम्मू-कश्मीर में ही भूपेन्द्र का अंतिम संस्कार कर दिया गया। बहन की आंखों के आंसू सूख चुके थे और जुबान पर सिर्फ एक बात कि भैया ने कहा था…राखी पर जरूर आऊंगा। गरीबी ने पूरे परिवार को गांव से बाहर भेज दिया दैनिक भास्कर की टीम ने देखा कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। घर में रोजमर्रा की जरूरतों का सामान भी सीमित नजर आया। भूपेंद्र की बहन ने बताया कि पिता दशरथ, मां नागेश्वरी और छोटा भाई अनुराग हिमाचल प्रदेश में मजदूरी कर रहे हैं। भूपेंद्र पहली बार पत्नी कचरा बाई के साथ जम्मू-कश्मीर गया था। गांव में सिर्फ दादी, मैं और उसका 3 साल का बेटा मानस रह गए थे। परिवार हर सदस्य रोजगार की तलाश में गांव छोड़ चुका था। बहन की आखिरी बार भाई को नहीं देख पाई भूपेंद्र की बहन ने बताया कि करीब एक महीने पहले भाई से मोबाइल पर बात हुई थी। उसने कहा था कि इस बार राखी पर जरूर घर आऊंगा। लेकिन राखी से पहले ही कुलगाम से उसकी मौत की खबर आ गई। एक हजार ईंट पर मिलते थे 980 रुपए भूपेंद्र के दोस्त करण प्रसाद कुलदीप ने बताया कि वे दोनों साथ पढ़े थे। छेरछेरा त्योहार के बाद भूपेन्द्र ने कहा था कि दोनों जम्मू जाकर ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करेंगे। मैं भी भूपेन्द्र के साथ काम करने वहां गया था। एक हजार ईंट बनाने पर हमें 980 रुपए मिलते थे। रहने और खाने का खर्च मजदूरों को खुद उठाना पड़ता था। बारिश शुरू होने के बाद मैं गांव लौट आया, लेकिन भूपेंद्र और उसकी पत्नी वहीं रुक गए। एक एकड़ खेत 30 हजार में गिरवी रखना पड़ा हिमाचल प्रदेश में मजदूरी कर रहे भूपेन्द्र के पिता दशरथ ने मोबाइल पर दैनिक भास्कर से कहा कि परिवार की आर्थिक स्थिति सालों से खराब है। उन्होंने बताया वे 2003 से मजदूरी के लिए बाहर जा रहे हैं। इस साल मजदूरी के लिए निकलने से पहले एक एकड़ खेत 30 हजार रुपए में गिरवी रखना पड़ा। पहली बार बेटा और बहू भी जम्मू कमाने गए थे। हमने प्रशासन से बेटे का शव गांव लाने की मांग की थी, लेकिन वहां ही अंतिम संस्कार कर दिया गया। हमारी परिवार और गांव के लोगों के बीच हम अपने बेटे का अंतिम संस्कार करना चाहते थे। लेकिन हम जम्मू से बहुत दूर हैं। अधिकारियों ने बताया कि वहां कर्फ्यू लगा है। इसलिए हम जम्मू भी नहीं पहुंच पाए। दादी आज भी कहती रहीं- सब लोग काम से आ गए घर में मौजूद भूपेंद्र की बुजुर्ग दादी की याददाश्त कमजोर है। उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा था कि परिवार पर कितना बड़ा दुख टूट पड़ा है। वह बार-बार यही कहती रहीं कि बेटा, बहू और पोता मजदूरी करके वापस आ जाएंगे। उन्हें यह नहीं बताया गया कि परिवार का एक सदस्य हमेशा के लिए बिछड़ चुका है। रोजगार की तलाश में 25% लोग गांव से बाहर जा रहे छुईहा ग्राम पंचायत के सरपंच धनीराम बंजारे ने बताया कि गांव की आबादी करीब 1400 है और यह आदिवासी बहुल गांव है। यहां लगभग 25 प्रतिशत लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं। उन्होंने बताया कि इस साल गांव से बहुत कम लोग जम्मू गए हैं। ज्यादातर लोग हैदराबाद और अन्य राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं। लोग बोले- पेट पालने गया था, अपराधी नहीं था ग्रामीणों ने कहा कि पहलगाम में जिस तरह आतंकियों ने धर्म पूछकर लोगों की हत्या की थी, वैसी ही घटना फिर सामने आई है। हमारे गांव का भूपेंद्र अपने परिवार का पेट पालने के लिए जम्मू-कश्मीर मजदूरी करने गया था। वह कोई अपराधी नहीं था, बल्कि मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का भविष्य संवारना चाहता था। आतंकियों ने उसकी जान ले ली। पूरे गांव में दुख और गुस्सा है। 3 साल के मासूम बच्चे के सिर से पिता का साया उठ गया। सरकार से हमारी मांग है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो और भूपेंद्र के परिवार को हर संभव सहायता दी जाए। ‘अगर गांव में रोजगार होता तो भूपेंद्र बाहर नहीं जाता’ ग्रामीण सेवकराम रात्रे ने कहा कि हमारे गांव में खेती के अलावा रोजगार का दूसरा साधन नहीं है। अगर गांव में ही काम मिलता, तो शायद भूपेंद्र जैसे युवाओं को हजारों किलोमीटर दूर मजदूरी के लिए नहीं जाना पड़ता। हमारी सरकार से मांग है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार से साधन उपल्बध करवाए। ताकि गांव के लोग गांव में रहकर काम कर सके। ………………………. इससे जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… कश्मीर आतंकी हमला, शादी का कर्ज चुकाने गया था दीपक: मामा बोले- 2 भाई वहां मौजूद थे, उनको भी आग देने नहीं दिया गया शुक्रवार देर शाम जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में आतंकियों ने छत्तीसगढ़ के 2 मजदूरों की गोली मारकर हत्या कर दी। मृतकों में सक्ती जिले का दीपक रात्रे (24) भी शामिल था। दैनिक भास्कर की टीम दीपक के घर हरदीडीह पहुंची। पढ़िए पूरी खबर
