फीफा वर्ल्ड कप में फैंस की अनोखी परंपराएं:डच फैंस का ऑरेंज ड्रेस में फैनवॉक, जापानी की सफाई संस्कृति, नॉर्वे का वाइकिंग रो रहा चर्चित

कुछ दिन पहले बोस्टन के एक व्यस्त रेलवे स्टेशन पर ऐसा नजारा दिखा, जिसने लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला दी। नॉर्वे के फुटबॉल फैंस चलते एस्केलेटर पर एक के पीछे एक बैठ गए। फिर सभी एक साथ आगे-पीछे झुकते हुए ऐसे हाथ चलाने लगे, जैसे किसी नाव में बैठकर चप्पू चला रहे हों। कुछ ही मिनटों में राहगीर भी रुक गए। किसी ने वीडियो बनाया तो कई लोग भी इस काल्पनिक नाव का हिस्सा बन गए। आमतौर पर रेलवे स्टेशन पर लोग अपनी-अपनी जल्दी में रहते हैं। ऐसे माहौल में यह दृश्य लोगों को परेशान भी कर सकता था, लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। कुछ देर के लिए पूरा स्टेशन हंसी, उत्साह और साथ होने के एहसास से भर गया। मनोवैज्ञानिक और ‘हाऊ चेंज रियली वर्क्स’ की लेखिका जूलिया धर कहती हैं कि वर्ल्ड कप के दौरान मैदान के बाहर हुई यह छोटी-सी घटना इंसानी जुड़ाव की बड़ी मिसाल है। जब दुनिया अकेलेपन की चुनौती से जूझ रही है, तब ऐसे साझा अनुभव लोगों में अपनापन और जुड़ाव की भावना पैदा करते हैं। सिर्फ नॉर्वे के फैंस ही नहीं, इस वर्ल्ड कप में दूसरे देशों के समर्थक भी अपनी परंपराओं से चर्चा में रहे। भीषण गर्मी के बीच हजारों डच फैंस ने नारंगी कपड़े पहनकर ‘ऑरेंज फैनवॉक’ निकाली, जिसमें रास्ते में मिलने वाले अनजान लोग भी शामिल होते गए। जापानी फैंस ने मैच खत्म होने के बाद स्टेडियम की सफाई की अपनी परंपरा निभाई। इन परंपराओं की शुरुआत किसी खेल संस्था या ब्रांड ने नहीं की, बल्कि फैंस ने खुद मिलकर इन्हें बनाया। जूलिया कहती हैं कि फैंस को किसी ने ऐसा करने का निर्देश नहीं दिया था। उन्होंने खुद यह परंपरा अपनाई और दूसरों को भी इसमें शामिल किया। अपनापन किसी को दिया नहीं जा सकता। यह तभी पैदा होता है, जब लोग किसी काम में साथ मिलकर हिस्सा लेते हैं। इंसान उन्हीं चीजों से सबसे ज्यादा जुड़ाव महसूस करता है, जिनके बनने में उसका योगदान होता है। साझा भागीदारी से पैदा होता है असली लगाव जूलिया कहती हैं कि कई संस्थाएं लोगों को जोड़ने के लिए बड़े कार्यक्रम करती हैं, लेकिन उनका असर अक्सर सीमित रह जाता है। फैन परंपराएं बताती हैं कि असली जुड़ाव साझा भागीदारी से पैदा होता है। हार्वर्ड के आईकिया इफेक्ट भी यही कहता है कि जिन चीजों को बनाने में लोगों की भागीदारी होती है, उनसे उनका लगाव ज्यादा होता है। स्टेडियम में जब लोग साथ गाना गाते हैं या हाथ उठाते हैं, तो वे खुद को भीड़ नहीं, बल्कि बड़े समुदाय का हिस्सा महसूस करते हैं।

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