अबूझमाड़ देश के उन इलाकों में शामिल है, जहां आज तक राजस्व सर्वे पूरा नहीं हो सका है। नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बाद अब यहां सबसे बड़ी चुनौती अधूरा सर्वे बन गया है। इसका फायदा उठाते हुए जंगल के भीतर लोग सरकारी जमीन को अपने कब्जे में लेने की कोशिश में है। जंगल में हो रही अवैध कटाई को रोकने के लिए राजस्व, वन विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम बनाई गई है। नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने दैनिक भास्कर को बताया कि अवैध कटाई की शिकायत मिलने के बाद संयुक्त टीम बनाई गई हैं। इस टीम के साथ सरपंचों को भी जोड़ा गया है। इसके अलावा एसडीएम को गांव-गांव जाकर ग्रामीणों से संवाद करने तथा पेड़ों के संरक्षण और संवर्धन के लिए जागरूक करने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि अब तक अबूझमाड़ के जंगल और जमीन का सर्वे नहीं हो पाया है। सर्वे के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि कौन-कौन सी जमीन किस-किस विभाग की है। जमीन का सर्वे पूरा होने के बाद ही राजस्व और वन विभाग अपनी-अपनी कार्रवाई कर सकेंगे। फिलहाल अब तक के सर्वे से यह स्पष्ट हो रहा है कि वहां सर्वे की गति काफी धीमी है। दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि तत्कालीन डॉ. रमन सिंह सरकार ने 18 मई 2015 को आईआईटी रुड़की को सर्वे का वर्कऑर्डर दिया था। उस समय पूरा इलाका नक्सलियों के प्रभाव में था, जिससे सर्वे की रफ्तार बेहद धीमी रही। वन और जिला अधिकारियों की रिपोर्ट के मुताबिक नौ साल में महज 3 प्रतिशत क्षेत्र का ही सर्वे हो पाया है। डीजीपीएस ड्रोन से दो महीने में पूरा हो सकता है सर्वे विशेषज्ञों के अनुसार डीजीपीएस-सक्षम ड्रोन 30 मिनट में एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का सर्वे कर सकता है। यदि पांच ड्रोन एक साथ काम करें तो प्रतिदिन करीब 80 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का सर्वे संभव है। इस आधार पर लगभग 4400 वर्ग किलोमीटर में फैले अबूझमाड़ का सर्वे करीब दो महीने में पूरा किया जा सकता है। पड़ताल में यह भी सामने आया कि वन विभाग के पास पहले से पर्याप्त संख्या में डीजीपीएस-सक्षम सर्वे ड्रोन उपलब्ध हैं। ऐसे में यह काम तत्काल शुरू किया जा सकता है। ड्रोन आधारित सर्वे पारंपरिक पद्धति की तुलना में अधिक तेज और सटीक माना जाता है। उदंती-सीतानदी में सफल रहा ड्रोन सर्वे
छत्तीसगढ़ में डिफरेंशियल ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (डीजीपीएस) आधारित ड्रोन सर्वे का इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में डिप्टी डायरेक्टर वरुण जैन ने इसी तकनीक से पौधरोपण क्षेत्रों और जंगल के भीतर अतिक्रमण की मैपिंग कराई है। यह ड्रोन 10 सेंटीमीटर तक की सटीक मैपिंग करने में सक्षम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही तकनीक बेहतर है। अब तक 27 गांवों में हो चुका है सर्वेक्षण
आईआईटी रुड़की अब तक 27 गांव और 6 माजराटोलों का सर्वे कर चुका है। इनमें 12 गांवों का ग्राम सीमा सर्वे पूरा हो गया है, जबकि विस्तृत सर्वे अभी बाकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा पारंपरिक सर्वे पद्धति से पूरे अबूझमाड़ का सर्वे पूरा होने में अभी कई साल लग सकते हैं। इस दौरान जंगलों की कटाई, नए अतिक्रमण, वन भूमि को कृषि भूमि में बदलने और अवैध लकड़ी कटाई जैसी गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण मुश्किल होगा। यदि यही स्थिति बनी रही तो जंगल का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है। इसलिए अब विशेषज्ञ डीजीपीएस आधारित ड्रोन सर्वे शुरू करने की जरूरत बता रहे हैं। स्थिति यह है कि सामान्य तौर पर राजस्व या वन क्षेत्र में एक पेड़ काटने के लिए पटवारी और वन विभाग को सूचना देना अनिवार्य होता है, लेकिन अबूझमाड़ में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के बावजूद न प्रशासन कार्रवाई कर पा रहा है और न वन विभाग। इसकी बड़ी वजह यह है कि क्षेत्र की राजस्व और वन सीमाएं अब तक अधिसूचित नहीं हैं। ऐसे में सर्वे और सीमांकन पूरा होना ही जंगल और जमीन को सुरक्षित रखने की पहली शर्त माना जा रहा है।
