धान में पानी की खपत,सही प्रबंधन से 30% तक बचत:वर्षा की अनिश्चितता-घटते भूजल की चुनौतियों के बीच नए तरीकों से मिल सकती है मदद

छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों का रकबा 57 लाख हेक्टेयर और रबी फसलों का रकबा 18 से 20 लाख हेक्टेयर है। खरीफ के कुल रकबे में धान फसलों का क्षेत्र सर्वाधिक है। धान की फसल को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है। ऐसे में सही सिंचाई प्रबंधन से कम पानी में भी बेहतर उत्पादन पाया जा सकता है। धान की फसल को पूरे सीजन में प्रति एकड़ 60 लाख लीटर तक पानी की जरूरत होती है। लेकिन सही मैनेजमेंट से पानी की जरूरत को 30 से 40 फीसदी तक घटाया जा सकता है। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के कारण जल स्रोतों में कमी, तापमान में वृद्धि, वर्षा की अनिश्चितता और घटते भूजल स्तर ने खेती-किसानी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। सिंचाई सुविधाओं का अभाव, परंपरागत सिंचाई पद्धति एवं फसल चक्र नहीं अपनाना इसके प्रमुख कारण हैं। यदि किसान आधुनिक और वैज्ञानिक सिंचाई तकनीकों के साथ फसल चक्र अपनाएं तो कम पानी में भी अधिक सिंचाई दक्षता के माध्यम से ज्यादा उत्पादन लिया जा सकता है। इससे उत्पादन लागत में कमी आएगी तथा किसानों की आय में वृद्धि होगी। कुछ ऐसी तकनीक, जिससे किसान बचा सकते हैं पानी, उत्पादन कर सकते हैं बेहतर प्रैक्टिस 1 : अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राईंग धान की खेती में पानी बचाने की एक प्रभावी तकनीक अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राईंग तकनीक है। ऐसे होती है बचत : खेत को लगातार पानी से भरा रखने के बजाय कुछ समय तक सूखने दिया जाता है, फिर सिंचाई की जाती है। इसका फायदा : फसल की पैदावार पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं, पर्यावरण संरक्षण में भी मदद, धान के खेतों में मीथेन गैस का उत्सर्जन कम होता है, ग्लोबल वार्मिंग रोकने में सहायता मिलती है, हवा मिलने से धान की जड़ें गहरी एवं मजबूत बनती हैं। प्रैक्टिस 2 : क्रांतिक अवस्था में सिंचाई फसल वृद्धि के दौरान जब सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है, उसे क्रांतिक अवस्था कहा जाता है। ऐसे होती है बचत : धान में रोपाई से कंसे निकलने की अवस्था तक खेत में पानी की सतह 2 से 5 सेमी रखनी चाहिए। कंसे निकलने के बाद से गभोट अवस्था तक 10 से 15 सेमी पानी की सतह रखनी चाहिए। इससे पानी की बचत होती है। इसका फायदा : धान की फसल में आवश्यकता से अधिक पानी देने से खेतों के पोषक तत्व भी बह जाते हैं। ऐसी सिंचाई करने से पोषक तत्व खेत में ही बने रहते हैं और पौधों की ग्रोथ होती है। प्रैक्टिस 3 : फसल चक्र अपनाकर एक ही खेत में अलग-अलग मौसम या वर्षों में क्रम बदलकर विभिन्न फसलों की खेती करना। ऐसे होती है बचत : 1 किलो चावल पैदा करने में लगभग 3000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। धान के बाद मक्का या दलहन-तिलहन लेने से जल उपयोग में कमी लाई जा सकती है। इसका फायदा : मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, कीट और रोगों का प्रकोप कम होता है, खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है, रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता घटती है। प्रैक्टिस 4: ड्रिप सिस्टम से बूंद-बूंद पानी पाइपों और ड्रिपर (छोटे छिद्रों) के माध्यम से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद करके पहुंचाया जाता है। ऐसे होती है बचत : ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद पहुंचता है। डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक से बोए गए धान में यह कारगर है। इससे 30 से 50 प्रतिशत तक पानी की बचत हो सकती है। इसका फायदा : खेत में जलभराव नहीं होता, पौधों को नियंत्रित मात्रा में पानी और पोषक तत्व मिलते हैं, पानी के साथ घुलनशील उर्वरक सीधे जड़ों तक पहुंचाए जा सकते हैं। पहले पानी ज्यादा लगता था अब तकनीक से बदलाव कांकेर जिले के नरहरपुर तहसील के ग्राम मानिकपुर निवासी किसान जनता राम नेताम बताते हैं कि वे 8 एकड़ कृषि भूमि में पानी की कमी के कारण पूरे रकबे में खेती नहीं कर पाते थे। इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने टपक (ड्रिप) सिंचाई पद्धति अपनाई। वर्तमान में बोरवेल में पानी कम होने के बावजूद वे ड्रिप इरिगेशन की बदौलत सफलतापूर्वक खेती कर रहे हैं। टपक सिंचाई से पौधों की जड़ों तक सीधे पानी पहुंचने से जहां जल की बचत हो रही है।

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