गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट ने सितंबर 2025 तिमाही में पहली बार 100 बिलियन डॉलर (करीब ₹9.06 लाख करोड़) का रेवेन्यू हासिल किया है। CEO सुंदर पिचाई ने इसे ‘माइलस्टोन क्वार्टर’ बताया। सर्च, यूट्यूब और क्लाउड जैसे सेगमेंट में डबल डिजिट ग्रोथ हुई। 5 साल पहले कंपनी का तिमाही रेवेन्यू 50 बिलियन डॉलर था। गूगल के तिमाही नतीजों से जुड़ी बड़ी बातें… 6 चैप्टर में गूगल की पूरी कहानी… गूगल के बिना जिंदगी कैसी होती? आज हर सवाल के जवाब ‘गूगल कर लो’ कहकर निकल जाते हैं, लेकिन 1998 से पहले सर्च करना था तो याहू पर घंटों लग जाते थे। फिर आए लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन – दो ऐसे जीनियस, जिन्होंने एक छोटे से प्रोजेक्ट से दुनिया की तीसरी बड़ी टेक कंपनी बना दी। ये उनकी स्टोरी है, चैप्टर बाय चैप्टर, जैसे कोई मजेदार फिल्म… चैप्टर 1- मुलाकात: पहली बार स्टैनफोर्ड में मिले 1995 में मिशिगन का लड़का लैरी पेज कंप्यूटर इंजीनियरिंग करने के लिए स्टैनफोर्ड पहुंचा। उसके मम्मी-पापा दोनों कंप्यूटर एक्सपर्ट थे, तो लैरी को बचपन से ही मशीनों का शौक चढ़ा। उधर सर्गेई ब्रिन, मॉस्को से आया रूसी लड़का। उसके पापा मैथ प्रोफेसर, मम्मी नासा साइंटिस्ट थी। छह साल की उम्र में फैमिली रूस में यहूदी उत्पीड़न से बचने के लिए अमेरिका आ गई थी। सर्गेई ब्रिन पहले से ही वहां स्टूडेंट थे। उन्होंने न्यू स्टूडेंट्स को कैंपस टूर देने का काम संभाला था। जब वो लैरी को टूर दे रहे थे तो सैन फ्रांसिस्को की पहाड़ियों पर घूमते हुए दोनों की बहस हो गई। शुरुआत में तो दोनों एक-दूसरे को पसंद नहीं आए, लेकिन बाद में अच्छे दोस्त बन गए। चैप्टर 2- जीनियस आइडिया: गलती से पड़ गया गूगल का नाम लैरी को पीएचडी थीसिस का टॉपिक ढूंढना था। वेब पर सर्च इंजन बनाना चाहता था, जो सिर्फ कीवर्ड्स न देखे, बल्कि पेजेस के बीच लिंक्स को रैंक करे। नाम रखा “बैकरब” – मतलब बैकलिंक्स से रैंकिंग। लेकिन ये आइडिया इतना कॉम्प्लिकेटेड था कि कंप्यूटिंग पावर और मैथ की जरूरत पड़ी। यहां सर्गेई की एंट्री हुई जो, मैथ के जादूगर थे। 1996 में दोनों ने स्टैनफोर्ड होमपेज पर एक्सपेरिमेंट शुरू किया। उन्होंने “पेजरैंक” एल्गोरिदम बनाया। ये बताता था कि कौन सा पेज कितना इंपॉर्टेंट है। ये फॉर्मूला गूगल सर्च का बेस बना। नाम? मैथ टर्म “गूगोल” से इंस्पायर्ड – 1 के पीछे 100 जीरो। इसका नाम लिखते समय गलती से GOOGLE लिख दिया गया। तब से नाम गूगल पड़ गया। चैप्टर 3- फंडिंग: एंजेल इन्वेस्टर राम श्रीराम का निवेश गूगल का ऑफिस गैरेज में चल रहा था। इसे बढ़ाने के लिए फंडिंग की जरूरत थी। 1998 में जब दोनों फंडिंग मांगने इनवेस्टर्स के पास पहुंचे तो उन्हें कहा गया- “पांच सर्च इंजन हैं, छठा क्यों?”। लेकिन सन माइक्रोसिस्टम्स के को-फाउंडर एंडी बेचटलशाइम को आइडिया पसंद आ गया। उन्होंने 1 लाख डॉलर का चेक दिया। फिर एंजेल इनवेस्टर राम श्रीराम और अमेजन के फाउंडर जेफ बेजोस दोनों ने 2.5 लाख-2.5 लाख डॉलर इन्वेस्ट किए। इस तरह गूगल की शुरुआत हो गई। पहला एम्प्लॉयी क्रेग सिल्वरस्टीन था, जिसे 12-15 राउंड्स के बाद सिलेक्ट किया गया था। चैप्टर 4- ऑफर: याहू ने खरीदना चाहा, गूगल ने मना कर दिया 2002 में याहू इंटरनेट की दुनिया में राजा था। सर्च इंजन से लेकर मेल सब कुछ याहू के पास था। लेकिन गूगल नया-नया होने के बाद भी तेजी से बढ़ रहा था। ऐसे में याहू के सीईओ टेरी सेमेल ने गूगल के फाउंडर को 3 बिलियन डॉलर का ऑफर दिया। लैरी और सर्गेई जानते थे कि गूगल की वैल्यू ज्यादा है तो उन्होंने 5 बिलियन डॉलर का काउंटर दिया। इसे लेकर हफ्तों नेगोशिएशन चली, लेकिन बात नहीं बनी। लैरी-सर्गेई ने ऑफर ठुकरा दिया। क्योंकि वो मानते थे कि गूगल सिर्फ सर्च नहीं, दुनिया की सारी जानकारी को ऑर्गनाइज करने वाला प्लेटफॉर्म बनेगा। पैसे से ज्यादा, विजन था। 2004 में गूगल 27 बिलियन डॉलर का आईपीओ लेकर आया। याहू पीछे छूट चुका था। 2008 में माइक्रोसॉफ्ट ने याहू को 44 बिलियन डॉलर में खरीदना चाहा। लेकिन वो ऑफर भी फाउंडर्स ने ठुकरा दिया। आज गूगल का मार्केट कैप 3 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है। चैप्टर 5- प्रोडक्ट: ईमेल को रेवोल्यूशनरी बनाया चैप्टर 6- नया दौर: अल्फाबेट और पीछे हटना 2012 का साल लैरी पेज के लिए मुश्किलों भरा साबित हुआ। उन्हें वोकल कॉर्ड पैरालिसिस नाम की बीमारी हो गई, जिससे उनकी आवाज कमजोर पड़ने लगी और बोलना बेहद कठिन हो गया। उन्होंने कॉन्फ्रेंस कॉल्स और प्रेस इवेंट्स को स्किप करना शुरू कर दिया। इस चुनौती के बीच लैरी और सर्गेई ब्रिन ने 2015 में एक बड़ा स्ट्रक्चरल चेंज किया। अल्फाबेट इंक. का जन्म हुआ जो गूगल की पैरेंट कंपनी बनी, ताकि गूगल सिर्फ सर्च इंजन तक सीमित न रहे, बल्कि हेल्थ, एनर्जी, सेल्फ-ड्राइविंग कार्स जैसी नई फील्ड्स में फैल सके। लैरी पेज अल्फाबेट के सीईओ बने, सर्गेई ब्रिन प्रेसिडेंट, और सुंदर पिचाई को गूगल का सीईओ बनाया गया। फिर आया 2019 का टर्निंग पॉइंट – लैरी और सर्गेई ने पूरी तरह स्टेप बैक ले लिया। सुंदर पिचाई को अल्फाबेट का भी सीईओ बना दिया गया। दोनों फाउंडर्स अब डेली ऑपरेशंस से दूर हो गए। ये फैसला नैचुरल था- 20 साल की मेहनत के बाद, वो अब फ्यूचर जनरेशन को हैंडओवर कर रहे थे। अल्फाबेट आज 3 ट्रिलियन डॉलर+ की वैल्यू वाली कंपनी है। पिचाई ने इसे क्लाउड, AI और क्वांटम कंप्यूटिंग में लीडर बना दिया है। कुल मिलाकर, लैरी और सर्गेई ने गूगल को सिर्फ कंपनी नहीं, बल्कि दुनिया बदलने वाला इकोसिस्टम बनाया। ———————– 1. एपल की मार्केट वैल्यू पहली बार 4 ट्रिलियन डॉलर पार: ये भारत की GDP के बराबर, iPhone-17 की लॉन्चिंग के बाद कंपनी का शेयर 15% बढ़ा एपल का मार्केट कैप पहली बार 4 ट्रिलियन डॉलर यानी 353 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है। यह आंकड़ा भारत की GDP के बराबर है। IMF के मुताबिक भारत की GDP अभी 4.13 ट्रिलियन डॉलर यानी 364 लाख करोड़ रुपए है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 2. चिप कंपनी एनवीडिया की वैल्यू 5 ट्रिलियन डॉलर पार: भारत की GDP से ₹90 लाख करोड़ ज्यादा; कंपनी मोबाइल-ड्रोन्स, ऑटोमैटिक गाड़ियों की चिप बनाती है सेमीकंडक्टर चिप बनाने वाली अमेरिकी कंपनी एनवीडिया का मार्केट कैप पहली बार 5 ट्रिलियन डॉलर यानी 453 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है। एनवीडिया यह आंकड़ा पार करने वाली दुनिया की पहली कंपनी भी बन गई है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…
