350 स्क्वायर फीट के फ्लैट में सिमटी जिंदगी:बुजुर्ग-दिव्यांग तीसरी मंजिल पर शिफ्ट, महिला बोली- भूपेश ने तंबू लगाकर रहने कहा, तभी लड़ाई लड़ पाएंगे

नकटी गांव में 80 मकानों पर हुई कार्रवाई के बाद विस्थापित परिवारों को नया रायपुर के सेक्टर-30 स्थित EWS आवासों में शिफ्ट किया गया है। दैनिक भास्कर की टीम सेक्टर-30 पहुंची। इस दौरान कई परिवार अब भी खुले में पड़े सामान के बीच अपनी नई जिंदगी व्यवस्थित करने की कोशिश करते मिले। कई घरों का सामान अभी तक शिफ्ट नहीं हो पाया है, क्योंकि करीब 350 वर्गफीट के छोटे फ्लैट में पूरे परिवार का सामान समेटना मुश्किल हो रहा है। एक छोटे हॉल, उससे जुड़े किचन, एक बेडरूम और बाथरूम वाले इन मकानों में बड़े परिवारों के लिए जगह कम पड़ रही है। अधिकांश विस्थापितों को तीसरी मंजिल पर आवास आवंटित किए गए हैं, जबकि कई परिवारों में बुजुर्ग, दिव्यांग और गंभीर बीमार लोग भी हैं। एक परिवार ने बताया कि उनके मवेशी नहीं मिल रहे हैं। विस्थापित परिवारों के सामने अब सिर्फ घर बदलने का नहीं, बल्कि नई जगह पर बुनियादी सुविधाओं के साथ जीवन शुरू करने की भी चुनौती है। वहीं एक महिला ने बताया कि भूपेश बघेल और कांग्रेस के नेता गांव आए थे। उन्होंने हमें गांव में ही तंबू लगाकर रहने की बात कही है। उन्होंने कहा कि ऐसा करने पर ही वो हमारी लड़ाई लड़ पाएंगे और कोर्ट जाएंगे। लेकिन बरसात के समय में छोटे-छोटे बच्चों के साथ तंबू में कैसे रहेंगे। कुछ समझ नहीं आ रहा है। पढ़िए नया रायपुर के सेक्टर-30 से ग्राउंड रिपोर्ट… पहले देखिए ये तस्वीरें- फ्लैट के बाहर आधा सामान बिखरा पड़ा जब दैनिक भास्कर की टीम EWS आवास की तीसरी मंजिल पर पहुंची तो एक छोटे से फ्लैट के बाहर आधा सामान अब भी बिखरा पड़ा था। कमरे के अंदर भी गृहस्थी का सामान इधर-उधर फैला हुआ था। इसी बीच एक 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला और उनकी दिव्यांग बेटी मिलीं। दोनों नए घर में सामान समेटने की कोशिश कर रही थीं, और घरों को साफ कर रही थी। लेकिन उम्र, बीमारी और सीमित जगह उनकी मुश्किलें बढ़ा रही थीं। बातचीत के दौरान बुजुर्ग भूरी पाल तीसरी मंजिल तक चढ़ने की मजबूरी, दिव्यांग बेटी की परेशानी और राशन कार्ड जैसी रोजमर्रा की दिक्कतों का जिक्र करते हुए भावुक हो गईं। उम्र 70 साल, पैरों में दर्द…तीसरी मंजिल पर रहने की मजबूरी भूरी पाल ने कहा कि नकटी गांव वहीं मेरा घर था, जहां मेरा पूरा परिवार बसता था। हमारे घर में एक बड़ा हॉल, दो कमरे, किचन और रहने के लिए पर्याप्त जगह थी। आज सब कुछ टूट गया। अब समझ ही नहीं आ रहा कि हमें कहां लाकर छोड़ दिया गया है। अब हमें तीसरी मंजिल पर मकान दिया गया है। मेरी उम्र 70 साल है और पैरों में तकलीफ रहती है। जिस दिन से यहां आई हूं, एक बार भी नीचे नहीं उतर पाई हूं। सीढ़ियां चढ़ना-उतरना मेरे बस की बात नहीं है। मेरी बेटी भी दिव्यांग है। उसे भी रोज सीढ़ियां चढ़ने-उतरने में भारी परेशानी होती है। राशन कार्ड गांव का है, राशन लाने का कोई साधन नहीं भूरी पाल ने बताया हमारा राशन कार्ड अभी भी गांव के पते पर बना हुआ है। यहां आने के बाद सबसे बड़ी चिंता राशन की है। मेरे बच्चों के पास कोई गाड़ी नहीं है, ऐसे में गांव जाकर राशन लाना बहुत मुश्किल है। उन्होंने प्रशासन से अपील करते हुए कहा, ‘हमारा राशन कार्ड यहीं ट्रांसफर कर दिया जाए, ताकि हमें राशन लेने के लिए इतनी दूर न जाना पड़े। भूरी पाल ने कहा कि इस उम्र में तीसरी मंजिल से बार-बार नीचे उतरना भी उनके लिए आसान नहीं है। ऐसे में रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी बड़ी परेशानी बन गए हैं। भूरी पाल के घर से कुछ दूरी पर दूसरे ब्लॉक में भी हालात कुछ ऐसे ही मिले। वहां पहुंचने के लिए हमें फिर तीसरी मंजिल तक सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं। यहां सुनीता बंजारे अपने परिवार के साथ नए फ्लैट में सामान जमाने की कोशिश कर रही थीं। हमसे बात करके हुए उन्होंने बताया क नकटी गांव में ही वहां कांग्रेस के नेता पहुंचे थे। वही से आ रहे हैं। ‘अस्पताल में आ गई हूं ऐसा लग रहा’ सुनीता बंजारे ने बताया कि उन्हें एक दिन पहले ही यहां शिफ्ट किया गया है। अभी तक पूरा सामान नहीं आ पाया है। जो सामान आया है, उसे रखने की भी जगह नहीं है। मुझे यहां आकर ऐसा लग रहा है कि मैं किसी अस्पताल में आ गई हूं। सब बंद-बंद लग रहा है। सुनीता ने कहा कि पुराने घर में काफी जगह थी। माता-पिता, भाई और पूरा परिवार साथ रहता था। अब एक छोटे से फ्लैट में सभी को रहना पड़ रहा है। परिवार में एक दिव्यांग सदस्य भी हैं, जो बैटरी वाली गाड़ी से चलते हैं। लेकिन तीसरी मंजिल पर लिफ्ट नहीं होने से उन्हें रोज सीढ़ियां चढ़ने-उतरने में दिक्कत होती है। पति को फेफड़े की बीमारी इसी घर में रहने वाले सुनीता बंजारे के पति आशोक बंजारे ने बताया कि उनके फेफड़े की बीमारी है। सांस लेने में तकलीफ रहती है। ऐसे में तीसरी मंजिल तक सीढ़ियां चढ़ना उनके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले हम खुले और बड़े घर में रहते थे। अब छोटे से फ्लैट में रहने की मजबूरी है। सुनीता ने यह भी बताया कि शिफ्टिंग के दौरान सबसे पहले उनका सामान ले जाया गया था, लेकिन अब तक उन्हें सामान की पूरी सूची और आवास आवंटन की पर्ची नहीं मिली है। इसलिए उन्हें चिंता है कि कहीं इस घर से भी बाहर ना निकाल दिया जाए। EWS फ्लैट के नीचे चूल्हे, लकड़ियां और बिखरा गृहस्थी का सामान…इन्हीं के बीच पूजा यादव मिलीं। उनके परिवार का काफी सामान अब भी खुले में पड़ा था। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि कार्रवाई के बाद उनका पूरा परिवार बिखर गया है और अब तक सामान्य जीवन शुरू नहीं हो सका है। घर की बिल्ली, कुत्ता और 3 गायें नहीं मिली पूजा यादव ने बताया, अभी तक हमने ठीक से खाना भी नहीं खाया है। न नहा पाए हैं और न ही समझ आ रहा है कि आगे क्या करें। जब घर पहुंचे तो देखा कि हमारा सामान बिना किसी व्यवस्था के बाहर निकालकर फेंक दिया गया था। हम अपना घर भी ठीक से नहीं देख पाए।’ उन्होंने बताया कि घर का आधे से ज्यादा सामान बिखर गया। उनके घर में बिल्ली, कुत्ता और तीन गायें थीं। इनमें एक गाय गर्भवती थी, लेकिन कार्रवाई के बाद वह भी नहीं मिल रही है। हमारी गायें कहां चली गईं, हमें कुछ पता नहीं है। पूजा ने कहा कि कांग्रेस के नेता गांव आए थे, हमें बरसात के मौसम में हमें तंबू लगाकर वही रहने की बात कही जा रही है। वे कह रहे हैं ऐसा करने पर ही वो हमारी लड़ाई लड़ पाएंगे, कोर्ट जाएंगे। वे कह रहे हैं कि सरकार घर दे रही है, उसे मत लो, वहीं जाकर रहो। छोटे-छोटे बच्चों के साथ तंबू में कैसे रहेंगे? बारिश होगी तो सब भीग जाएगा। समझ नहीं आ रहा कि अब जिंदगी कैसे चलेगी। प्रधानमंत्री आवास टूटा, अब छोटे मकान में आ गए इसी बीच अपने बिखरे सामान के पास खड़े हीरा लाल मिले। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने बताया कि कार्रवाई के बाद उनका परिवार पूरी तरह बेघर हो गया है। हीरा लाल ने कहा हमारा सारा सामान यहां-वहां बिखरा पड़ा है। न रहने की कोई व्यवस्था है और न ही खाने-पीने का कोई ठिकाना। समझ नहीं आ रहा कि अब क्या करें। हीरा लाल ने बताया कि मैंने कई साल की मेहनत से अपना घर बनाया था। मेरे पिता का मकान जो प्रधानमंत्री आवास स्वीकार हुआ था, उसे भी तोड़ दिया गया। घर में रखे जरूरी दस्तावेज मलबे में दब गए। अभी तक वे हमें नहीं मिले हैं। प्रशासन का खाना खा रहे हैं, लेकिन पेट नहीं भरता EWS आवास में मिले राजू ने बताया कि यहां खाने की व्यवस्था प्रशासन कर रहा है। होटल के खाने से की जा रही है, लेकिन उससे पेट नहीं भरता। राजू ने कहा, हम कैसा खाना खाते हैं, यह हम ही जानते हैं। नाश्ते और खाने में थोड़ा-सा चावल, दाल, सब्जी और सलाद मिलता है। मात्रा इतनी कम होती है कि पेट नहीं भरता। जब से यहां आया हूं, एक दिन भी भरपेट खाना नहीं खा पाया हूं। उन्होंने बताया कि विस्थापन के बाद उनका काम भी छूट गया है। रोजी-रोटी का संकट अलग है और रोज नकटी गांव से नवा रायपुर आने-जाने में करीब 100 रुपए का पेट्रोल भी खर्च हो रहा है। उन्होंने कहा कि घर टूटने के बाद अब परिवार चलाने की चिंता सबसे बड़ी हो गई है। ये तस्वीरें भी देखिए… ………………….. इससे जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… नकटी गांव के ग्रामीणों ने घेरा कलेक्ट्रेट: EWS मकानों की सुविधाओं पर उठाए सवाल; कांग्रेस MLA बोलीं- गरीबों का घर उजाड़कर विधायक आवास नहीं चाहिए छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नकटी गांव में सोमवार को 80 घरों पर बुलडोजर चला दिया गया। अब इसके विरोध में बुधवार को प्रभावितों ने कलेक्ट्रेट का घेराव किया। उनका कहना है कि प्रशासन ने घर दिए हैं, जिनमें किसी तरह की सुविधाएं नहीं हैं। घर इतने छोटे हैं कि उसमें परिवार का रह पाना संभव नहीं है। पढ़ें पूरी खबर

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