13 की उम्र में मां बन रहीं पहाड़ी कोरवा लड़कियां:20 तक 3 बच्चे, शादी का इंतजार, लिव-इन जैसी ढुकू प्रथा में रहते हैं

सरगुजा जिले की पहाड़ी कोरवा बस्तियों में ढुकू प्रथा आज भी प्रचलित है। इस परंपरा के तहत लड़का-लड़की अपनी मर्जी से साथ रहने लगते हैं और बाद में परिवार इस रिश्ते को स्वीकार कर लेता है। यहां लड़कियां 13-14 साल की उम्र में साथी के साथ रहने लगती हैं और 19-20 साल की उम्र तक दो से तीन बच्चों की मां बन जाती हैं। इनमें कई जोड़े ऐसे भी मिले, जो सालों से साथ रह रहे हैं, लेकिन उनकी शादी अब तक नहीं हुई है। पढ़िए विशेष रूप से संरक्षित पहाड़ी कोरवा जनजाति की बस्ती से दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट। पहले देखिए ये तस्वीरें-
सरगुजा जिले के आसनडीह गांव में सुबह से ही बादल छाए हुए थे। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। गांव के आखिरी छोर से एक पक्की सड़क पहाड़ी की ओर जाती दिखाई दी। स्थानीय लोगों ने बताया, ‘उपर गोटीडूमर है…वहीं पहाड़ी कोरवा रहते हैं।’ हम उसी सड़क पर आगे बढ़ गए। कुछ मिनट बाद गांव पीछे छूट चुका था। सामने पहाड़ी पर बसी छोटी-सी बस्ती दिखाई देने लगी। दूर-दूर बने मिट्टी के घर, घरों के बीच फैली हरियाली और आसपास खेलते बच्चे। पहाड़ी पर हवा तेज थी और बीच-बीच में बारिश की बूंदें चेहरे पर पड़ रही थीं। आसनडीह की कुल आबादी करीब 980 है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक यहां 67 पहाड़ी कोरवा परिवार रहते हैं, जिनकी आबादी 272 दर्ज है। गांव से अलग पहाड़ी पर बसी ये बस्ती इन्हीं परिवारों का ठिकाना है। गोटीडूमर पहुंचते ही सबसे पहले बच्चों की नजर हम पर पड़ी। कुछ बच्चे घरों के पीछे छिप गए, कुछ दूर खड़े होकर देखने लगे। कई बच्चे बिना चप्पलों के थे। कुछ के शरीर पर पूरे कपड़े भी नहीं थे। घरों की दीवारों पर हाल ही में हुई जनगणना के दौरान लिखे गए नंबर दिखाई दे रहे थे। इसी बीच एक घर के बाहर भीड़ जैसी दिखाई दी। एक युवक हाथ में लैपटॉप लिए बैठा था और उसके आसपास कुछ महिलाएं और बच्चे खड़े थे। पहाड़ी कोरवाओं की इस बस्ती में लैपटॉप देखकर एक पल को लगा कि शायद विकास यहां तक पहुंच चुका है। लेकिन नजर ठीक युवक के बगल बीना कपड़ों के खेल रहे बच्चे पर गई तो इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी दिख गया। हमने युवक से बात की। उसने अपना नाम अमीन साय बताया। अमीन ने कहा कि वह दूसरे गांव से लैपटॉप लेकर आया है। गांव के ज्यादातर लोगों ने पहले कभी लैपटॉप नहीं देखा था, इसलिए वह उन्हें दिखाने लाया है। खुद भी उसे चलाना सीख रहा है और चाहता है कि गांव के दूसरे लोग भी इसे देखें-समझें। लैपटॉप की स्क्रीन पर क्या चल रहा है, यह देखने के लिए बच्चे उसके आसपास खड़े थे और बड़े ध्यान से उसे देख रहे थे। वहीं लैपटॉप देखते हुए 2 छोटे बच्चों को संभालती एक युवती दिखाई दी। उसकी उम्र ज्यादा से ज्यादा 19-20 साल लग रही थी। हमने बातचीत शुरू की। ‘नाम क्या है तुम्हारा?’ ‘उर्मिला…’उसने धीरे से जवाब दिया। बात आधार कार्ड और राशन कार्ड से शुरू हुई। उर्मिला ने बताया कि उसका आधार कार्ड तो बन गया है लेकिन उसके पति का नहीं बन पाया। इसलिए राशन कार्ड भी नहीं बन सका है। ‘पति का आधार क्यों नहीं बना?’ ‘अंबिकापुर गए थे…फिंगर प्रिंट नहीं आया। फिर नहीं बना।’ इतना कहकर उर्मिला हमें अपने पिता के घर की ओर ले गई। उम्मीद थी कि शायद वहां आधार कार्ड मिल जाए। घर के भीतर काफी देर तक खोजबीन चली लेकिन दस्तावेज नहीं मिले। वापस बाहर आकर बातचीत आगे बढ़ी। ‘घर में कितने लोग हैं?’ ‘3 बच्चे हैं…’ उस समय उसके साथ केवल 2 बच्चे दिखाई दे रहे थे। ‘तीसरा कहां हैं?’ ‘बड़ा वाला घर में सो रहा है।’ ‘बच्चों की उम्र कितनी है?’ उर्मिला ने एक-एक कर बताया, ‘बड़ा लड़का 4 साल का है…लड़की 3 साल की…छोटा 1 साल का है।’ ‘और तुम्हारी उम्र?’ उर्मिला मुस्कुराई। फिर बोली, ‘पता नहीं…19-20 साल होगी।’ उर्मिला की बताई उम्र और उसके बड़े बेटे की उम्र से संकेत मिलता है कि उसने 15-16 साल में ही पहला बच्चा जन्म दिया। हमने पूछा कि – ‘शादी कब हुई थी?’ इस सवाल पर उर्मिला ने सिर हिलाया। ‘शादी नहीं हुई है।’ उर्मिला ने बताया कि वह और उसका साथी ढुकू प्रथा के तहत साथ रहने लगे थे। इस प्रथा में लड़का और लड़की अपनी मर्जी से एक साथ रहने लगते हैं। परिवार और समाज इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं। दोनों को पति-पत्नी की तरह मान्यता मिल जाती है, लेकिन औपचारिक शादी जरूरी नहीं होती। आज उर्मिला तीन बच्चों की मां है। उसके परिवार ने उसे स्वीकार कर लिया है। समाज भी उसे विवाहित महिला की तरह देखता है, लेकिन कागजों में उसकी शादी नहीं हुई। उर्मिला के लिए यह कोई असामान्य बात नहीं थी। वह पूरी सहजता से अपने बच्चों को संभाल रही थी। मानो उसकी जिंदगी की यही सामान्य रफ्तार हो। 13-14 साल की उम्र में ही लड़कियां साथी के साथ रहने लगती हैं उर्मिला से बात करते-करते उसके पिता तीजन भी वहां आ गए। हमने उनसे पूछा कि उर्मिला की शादी कब हुई थी। इस पर तीजन ने साफ कहा, ‘अभी शादी नहीं हुई है।’ फिर उन्होंने ढुकू प्रथा के बारे में बताना शुरू किया। उर्मिला की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी बड़ी बेटी भी इसी तरह ढुकू प्रथा के जरिए अपने साथी के साथ रहने लगी थी। दोनों को परिवार और समाज ने स्वीकार कर लिया, लेकिन अब तक उनकी औपचारिक शादी नहीं हुई है। बातचीत के दौरान तीजन ने एक और बात बताई, जिसने चौंकाया। उन्होंने कहा, ‘उर्मिला के बाद मेरी छोटी बेटी भी ढुकू करके चली गई है।’ जब हमने उसकी उम्र पूछी तो उन्होंने बताया कि वह करीब 13 साल की है। ‘अभी कहां है?’ हमने पूछा। तीजन ने बताया, ‘जिस लड़के के साथ गई है, उसी के साथ इसी गांव में अलग रहती है। अभी बाजार गई है।’ तीजन के मुताबिक, गोदीडूमर और आसपास की पहाड़ी कोरवा बस्तियों में यह कोई नई बात नहीं है। यहां ज्यादातर लड़के-लड़कियां पहले ढुकू करते हैं और बाद में दोनों परिवार मिलकर शादी कराते हैं। शादी का खर्च भी दोनों पक्ष मिलकर उठाते हैं। ‘बच्चे अपनी मर्जी से साथ रहते हैं’ हालांकि, तीजन यह भी मानते हैं कि कम उम्र में साथ रहने और जल्दी बच्चे होने के अपने नुकसान हैं। उन्होंने कहा, ‘कम उम्र में बच्चा होने से परेशानी तो होती है। मां भी कमजोर रहती है, बच्चा भी कमजोर होता है, लेकिन बच्चे अब हमारी कहां सुनते हैं। समझाते हैं, फिर भी अपनी मर्जी से चले जाते हैं।’ तीजन यह बात बिल्कुल सामान्य अंदाज में कह रहे थे। उनके चेहरे पर न चिंता दिख रही थी और न ही किसी तरह का विरोध। मानो यह सब इस समाज की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हो। लेकिन उनकी बातों से यह जरूर साफ हो रहा था कि ढुकू प्रथा के कारण कम उम्र में साथ रहने और जल्दी मां बनने की परंपरा आज भी इस बस्ती में जारी है। ढुकू के बाद 3 बच्चे हुए, लेकिन कोई भी स्कूल नहीं पहुंचा गोदीडूमर में दिनभर की बातचीत के दौरान उर्मिला अकेली नहीं थी। आगे मिलने वाले कई परिवारों की कहानी भी कमोबेश ऐसी ही निकली। उर्मिला के घर से थोड़ा आगे बढ़ने पर एक नया बना मकान दिखाई दिया। पहाड़ी की ढलान पर बना यह एक कमरे का छोटा सा घर था। इसी घर में फदलू अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ रहता है। हमने फदलू से बात की तो उसने बताया कि वह भी पिछले करीब सात साल से ढुकू प्रथा के तहत ही रह रहा है। फदलू को ठीक-ठीक साल तो याद नहीं था, लेकिन उसने बताया कि जब वह अपनी साथी के साथ रहने लगा था तब उसकी उम्र करीब 17-18 साल रही होगी। लड़की की उम्र भी करीब 15 साल के आसपास थी। ‘कैसे मिले थे?’ हमने पूछा। फदलू बोला, ‘पास के गांव के बाजार गए थे…वहीं पसंद आ गई। फिर साथ रहने लगे।’ फदलू के घर के बाहर उसके बच्चे खेल रहे थे। हमने बच्चों की उम्र पूछी तो वह ठीक से नहीं बता पाया। उसने कहा, ‘पता नहीं, कितना उम्र होगा।’ हालांकि बातचीत और बच्चों को सामने से देखने पर इतना समझ आया कि उसके तीन बच्चों में से 2 अब स्कूल जाने लायक उम्र के हो चुके हैं। लेकिन दोनों ही स्कूल नहीं जाते। फदलू ने बताया कि ‘हाल ही में आधार कार्ड बना है लेकिन राशन कार्ड नहीं बन पाया है। अब वापस आकर यहीं घर बनाकर रह रहे हैं,’ फदलू की बातों में किसी तरह की शिकायत नहीं थी। न बच्चों के स्कूल नहीं जाने को लेकर, न दस्तावेज नहीं बनने को लेकर। कम उम्र में साथ रहने और जल्दी बच्चे होने को लेकर भी वह इसे कोई समस्या नहीं मानता। गोदीडूमर की पहाड़ी पर उर्मिला के बाद फदलू की कहानी भी यही बता रही थी कि यहां ढुकू प्रथा सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। कम उम्र में साथ रहना, जल्दी मां-बाप बन जाना और फिर परिवार बढ़ना यहां कई घरों की एक जैसी कहानी है। हाथ पर लिखकर बताई अपनी कहानी फदलू के घर से आगे बढ़ते हुए हम एक और घर के सामने पहुंचे। घर के बाहर एक कम उम्र की युवती अपने दो छोटे बच्चों और सास के साथ चुपचाप बैठी थी। आसपास बच्चे खेल रहे थे, लेकिन वह खामोशी से सबको देख रही थी। हमने उससे बातचीत करने की कोशिश की। पहले तो उसने हमारी तरफ देखा, फिर हाथ के इशारे से बताया कि वह न बोल सकती है और न ही सुन सकती है। फिर उसने इशारों से बताया कि वह थोड़ा-बहुत लिखना जानती है। पास में पड़ी एक लकड़ी उठाई और अपनी हाथ पर अपना नाम लिख दिया – शीला। हमने उसके पति का नाम पूछा। शीला ने फिर अपने नाम के उपर अपने पति का नाम लिखा – नरहर साय। इसके बाद पूरी बातचीत इशारों और जमीन पर लिखे शब्दों के सहारे आगे बढ़ी। शीला ने बताया कि वह ढुकू प्रथा के जरिए यहां नहीं आई है। उसे दूसरे गांव से ब्याह कर इस घर में लाया गया था। हालांकि जब उसकी शादी हुई तब उसकी उम्र भी 18 साल से कम थी। पूरा परिवार बोल-सुन नहीं सकता शीला के घर में उसके पति, पति के भाई, सास और ससुर समेत कुल 6 लोग ऐसे हैं जो बोल और सुन नहीं सकते। घर के आंगन में खेल रहे उसके बच्चों की तरफ इशारा करते हुए उसने बताया कि उसका बड़ा बेटा भी बोल और सुन नहीं सकता। हालांकि तीन महीने का छोटा बच्चा आवाज सुनकर रिएक्ट करता है। यह बताते वक्त उसके चेहरे पर हल्की सी राहत दिखाई दी। हमने सरकारी योजनाओं के बारे में पूछा। शीला ने बताया कि उसका आधार कार्ड और राशन कार्ड बना हुआ है। परिवार को सरकारी राशन भी मिलता है, लेकिन वह पूरे महीने नहीं चल पाता। रोजगार के बारे में पूछने पर उसने हाथ से पहाड़ी और जंगल की तरफ इशारा किया। फिर समझाया कि घर में कोई स्थायी काम नहीं है। जंगल से जो मिल जाए, उसी से गुजारा होता है। कभी कंद-मूल, कभी जंगल की दूसरी उपज, और कभी मजदूरी का छोटा-मोटा काम। शीला का परिवार भी उन परिवारों में शामिल है जहां कई सदस्य किसी न किसी दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहे हैं। गांव के सचिव के मुताबिक, आसनडीह में 20 दिव्यांग लोग दर्ज हैं। गोटीडूमर में घूमने के दौरान भी हमें कई ऐसे परिवार मिले, जहां एक या उससे ज्यादा सदस्य किसी न किसी दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहे हैं। हालांकि इन दिव्यांगताओं की वजह क्या है, इसे लेकर कोई आधिकारिक अध्ययन सामने नहीं आया है। स्वास्थ्य विभाग के जानकारों का कहना है कि किसी भी दिव्यांगता के कारणों की पुष्टि मेडिकल जांच और विस्तृत अध्ययन के बाद ही की जा सकती है मां-बाप देख सकते हैं, लेकिन तीनों बेटे नहीं गोटीडूमर में आगे बढ़ने पर हम एक ऐसे घर पहुंचे, जहां की कहानी बाकी घरों से अलग थी। घर के बाहर तीन बच्चे बैठे हुए थे। पहली नजर में ही समझ आ गया कि तीनों देख नहीं सकते। हमने उनसे बातचीत शुरू की तो उन्होंने अपने नाम नकलू, सकलू और मंगलू बताया। तीनों सगे भाई हैं और तीनों ही दृष्टिबाधित हैं। घर पर उस समय सिर्फ यही तीनों थे। उनके माता-पिता साप्ताहिक बाजार गए हुए थे। हैरानी की बात यह थी कि मां-बाप दोनों देख सकते हैं, लेकिन उनके तीनों बेटे दृष्टिबाधित हैं। बातचीत के दौरान नकलू ने बताया कि घर की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है। माता-पिता के पास कोई नियमित काम नहीं है। कभी गांव या आसपास मजदूरी का काम मिल जाए तो चले जाते हैं, नहीं तो जंगल और सरकारी राशन के सहारे ही परिवार का गुजारा चलता है। ‘जंगल से जो मिल जाए और राशन का चावल, उसी से काम चल जाता है,’ नकलू ने कहा। बातचीत में दस्तावेजों और सरकारी योजनाओं तक पहुंच की समस्या भी सामने आई। तीनों भाइयों में सिर्फ सकलू का ही आधार कार्ड बन पाया है। इसी वजह से उसे दिव्यांग पेंशन मिल रही है। नकलू और मंगलू का आधार कार्ड अब तक नहीं बन सका है। गांव के सचिव जगदीश साय ने बताया कि दोनों बच्चों का आधार कार्ड बनवाने के लिए वह दो बार उन्हें अंबिकापुर तक लेकर गया था। आवेदन की पावती भी उसके पास है, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी आधार कार्ड जारी नहीं हुआ। इसका असर यह है कि आधार से जुड़ी कई सरकारी सुविधाओं का लाभ दोनों बच्चों को नहीं मिल पा रहा है। तीनों भाइयों में सकलू सातवीं और मंगलू तीसरी कक्षा में पढ़ रहे हैं। दोनों कुनकुरी के पास बतौली स्थित आश्रम में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। पहाड़ी पर बसे इस छोटे से घर में बैठे इन तीन भाइयों की कहानी सिर्फ दिव्यांगता की नहीं है, बल्कि उन चुनौतियों की भी है जिनसे जूझते हुए उनका परिवार रोजमर्रा की जिंदगी आगे बढ़ा रहा है। गोटीडूमर में घूमने के दौरान कई दिव्यांग लोग और परिवार मिले। गांव के बुजुर्ग बोले- छोटी उम्र में ढुकू बन रही चिंता बस्ती में घूमते-घूमते हमारी मुलाकात गांव के एक बुजुर्ग से हुई। उम्र पूछने पर वह मुस्कुरा दिए। बोले, ‘ठीक-ठीक तो नहीं पता, लेकिन 100 साल के आसपास हो गए होंगे।’ उन्होंने बताया कि उनके समय में शादी का फैसला परिवार करता था। उनके पिता ने उनकी और उनके भाई लक्ष्मण दोनों की शादी कराई थी। ढुकू प्रथा पर बात छिड़ी तो बुजुर्ग ने कहा कि उन्हें इस परंपरा से कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन चिंता इस बात की है कि कई लड़के-लड़कियां बहुत कम उम्र में ही साथ रहने लगते हैं। ‘बालिग होने के बाद ढुकू करें तो कोई परेशानी नहीं है, लेकिन छोटी उम्र में ही साथ रहने लगते हैं और फिर जल्दी बच्चे भी हो जाते हैं। इससे मां और बच्चे दोनों की सेहत पर असर पड़ता है,’ उन्होंने कहा। आसनडीह के रहने वाले अजब सिंह भी कुछ ऐसी ही चिंता जताते हैं। अजब खुद पहाड़ी कोरवा नहीं हैं, लेकिन इलाके को करीब से देखते रहे हैं। उनका कहना है कि सड़क, राशन, आवास जैसी सुविधाएं तो पहुंची हैं, लेकिन जागरूकता अब भी बड़ी चुनौती है। ‘कई बार नाबालिग लड़के-लड़कियां बिना बताए घर छोड़ देते हैं। कुछ महीने बाद लौटते हैं तो अलग झोपड़ी बनाकर रहने लगते हैं। कई बार उनके साथ एक-दो नहीं, बल्कि दो-तीन बच्चे भी होते हैं और उम्र मुश्किल से 19-20 साल होती है,’ वे बताते हैं। अजब सिंह के मुताबिक, कम उम्र में मां बनने का असर महिलाओं और बच्चों दोनों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। उनका कहना है कि गांव में नशे की समस्या भी है और जागरूकता की कमी के कारण कई परिवार इसे गलत नहीं मानते। दिनभर की बातचीत में उर्मिला, फदलू और दूसरे परिवारों की कहानियां भी इसी तस्वीर को सामने रखती हैं। पहाड़ी कोरवा समाज में ढुकू आज भी सामाजिक रूप से स्वीकार्य है, लेकिन कम उम्र में साथ रहने और जल्दी मां-बाप बनने को लेकर गांव के भीतर भी चिंता की आवाजें सुनाई देने लगी हैं। शादी हुई, फिर भी कम उम्र में मां बनीं गोटीडूमर में सिर्फ ढुकू प्रथा के जरिए बने रिश्तों में ही कम उम्र में बच्चे नहीं हो रहे हैं। यहां औपचारिक शादी करने वाले कई जोड़ों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बस्ती में आगे बढ़ने पर हमारी मुलाकात ललीता से हुई। उसके साथ तीन बच्चे थे। बातचीत में उसने बताया कि उसकी शादी हुई थी, लेकिन तब उसकी उम्र 16 साल थी। ‘18 साल की उम्र में मेरा पहला बच्चा हुआ था,’ ललीता ने बताया। आज उसके 3 बच्चे हैं। ललीता और उसके पति का आधार कार्ड बन चुका है, लेकिन परिवार का राशन कार्ड अब तक नहीं बन पाया है। ललीता से बातचीत चल ही रही थी कि पास खड़े 21 वर्षीय बजरू भी चर्चा में शामिल हो गए। उसने बताया कि उसकी शादी 18 साल की उम्र में हुई थी, जबकि उस समय उसकी पत्नी करीब 15 साल की थी। आज उनके दो बच्चे हैं। हालांकि, बजरू की सोच गांव के कई अन्य युवाओं से अलग दिखाई दी। उन्होंने कहा, ‘दो बच्चे काफी हैं। अब मैं और बच्चे नहीं चाहता।’ पहाड़ी कोरवा जनजाति विशेष रूप से संरक्षित जनजातीय समूह (PVTG) में शामिल है। समुदाय की आबादी बढ़ाने के उद्देश्य से यहां नसबंदी पर रोक है। ऐसे में परिवार नियोजन के विकल्प सीमित हो जाते हैं। बजरू ने बताया कि वह आठवीं तक पढ़ा है। उसकी पत्नी कभी स्कूल नहीं जा सकी, लेकिन वह अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है। उसने कहा ‘दोनों बच्चे स्कूल जाते हैं। मैं चाहता हूं कि वे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें,’ बस्ती में बातचीत के दौरान बजरू उन युवाओं में दिखे जो बच्चों की पढ़ाई और छोटे परिवार की बात कर रहे था। शाम होने लगी थी। गोटीडूमर की पहाड़ी पर बच्चे अब भी मिट्टी में खेल रहे थे। उर्मिला अपने बच्चों को संभाल रही थी। कहीं 13 साल की लड़की ढुकू कर अलग गृहस्थी बसा चुकी थी, तो कहीं 21 साल का बजरू अपने बच्चों को पढ़ाने का सपना देख रहा था। पहाड़ी कोरवाओं की इस बस्ती में परंपरा और बदलाव दोनों साथ-साथ दिखाई देते हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि आने वाले वर्षों में इनमें से कौन ज्यादा मजबूत साबित होगा।

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