सुप्रीम कोर्ट ने बिहार चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग को SIR के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और उसे निष्पक्ष एवं शुद्ध मतदाता सूची सुनिश्चित करने का अधिकार है। अदालत ने माना कि विशेष परिस्थितियों में अलग प्रक्रिया अपनाना संविधान और कानून के खिलाफ नहीं है। कोर्ट ने संदिग्ध नागरिकता के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए व्यक्तियों के नाम चार हफ्ते में केंद्र सरकार को भेजने का निर्देश भी दिया है। बिहार में यह प्रक्रिया शुरू होने के बाद इसे चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है और मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। SIR प्रोसेस में उठे 5 सवाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश सवाल: क्या ECI के पास SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) करने की शक्ति है? आदेश: यह नहीं कहा जा सकता कि ECI ने SIR का प्रयोग करके अपनी वैधानिक शक्तियों के दायरे से बाहर जाकर काम किया है। इसे ‘अल्ट्रा वायर्स’ (गैरकानूनी) भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह प्रक्रिया उस सामान्य प्रक्रिया से अलग है जो आमतौर पर अपनाई जाती है। विवादित SIR का उद्देश्य किसी प्रक्रिया को बाधित करना नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक जनादेश को सुरक्षित करना है। सवाल: क्या इसका कोई वैध उद्देश्य है और क्या इसके लिए अपनाए गए उपाय सटीक हैं? आदेश: कोर्ट ने कहा कि SIR की प्रक्रिया संतुलित और सही है, इसमें कोई मनमानी नहीं हुई। इसका मकसद वोटर लिस्ट को सही और साफ रखना है ताकि निष्पक्ष चुनाव हो सकें। कोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग ने जो कदम उठाए हैं, वे जरूरत से ज्यादा सख्त या गलत नहीं हैं। सवाल: क्या SIR ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ और संबंधित नियमों के विपरीत है? आदेश: चूंकि SIR कानूनी रूप से मान्य और उचित है इसलिए यह ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (RP Act) का उल्लंघन नहीं करता है। सवाल: क्या ECI के पास जानकारी या दस्तावेज मांगने का अधिकार है? आदेश: 11 दस्तावेजों पर विचार करने और हमारे आदेश के माध्यम से आधार कार्ड को शामिल करने के बाद, हम इस तर्क को स्वीकार करने में असमर्थ हैं कि ECI द्वारा अपेक्षित दस्तावेजों का समूह मनमाना है। यह भी व्यावहारिक नहीं है कि दस्तावेजों का सत्यापन बिना किसी दिशा-निर्देश के किया जाए। सवाल: SIR के तहत जिन लोगों के नाम काट दिए गए हैं, उनका क्या होगा? आदेश: जिन लोगों के नाम हटा दिए गए हैं, ECI को 4 हफ्तों के अंदर नागरिकता से संबंधित सक्षम प्राधिकारी को उनका मामला भेजना होगा। उस प्राधिकारी को विधानसभा चुनावों या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले उन्हें नोटिस देना होगा, उन्हें अपनी बात रखने का अवसर देना होगा और उनके दावों पर फैसला करना होगा। एक बार जब यह तय हो जाता है कि वे नागरिक हैं, तो उनके नाम मतदाता सूचियों में शामिल किए जाने चाहिए। बिहार में 1 अक्टूबर 2025 को जारी हुई थी फाइनल लिस्ट निर्वाचन आयोग ने 30 सितंबर 2025 को फाइनल वोटर लिस्ट जारी की थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हटाए गए वोटर्स की सूची और कारण भी सार्वजनिक किए गए थे। चुनाव आयोग ने बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की फाइनल लिस्ट 1 अक्टूबर 2025 को जारी की थी। इसके बाद बिहार में वोटर्स की संख्या 6% घटकर 7.42 करोड़ हो गई। फाइनल लिस्ट से 69.29 लाख नाम कटे। 21.53 लाख नए नामों को जोड़ा गया। SIR से पहले जून 2025 में बिहार में कुल 7.89 करोड़ वोटर्स थे। पहली ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने के बाद ये आंकड़ा 7.24 करोड़ हो गया। इसमें 65.63 लाख लोगों के नाम कटे थे। पहले ड्राफ्ट लिस्ट से जो 65 लाख नाम कटे थे, उसमें 17 लाख नामों को लिस्ट में जोड़ा गया। नई लिस्ट में 22.34 लाख लोग मृत पाए गए। 6.85 लाख लोगों के 2 जगह नाम मिले। 36.44 लाख लोग दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं। फाइनल लिस्ट में पटना में 1.63 लाख वोटर्स बढ़े फाइनल SIR लिस्ट में पटना जिले में 1 लाख 63 हजार 600 मतदाता बढ़े। पटना में पहले 46 लाख 51 हजार 694 मतदाता थे। फाइनल रोल में 48 लाख 15 हजार 694 मतदाताओं के नाम हैं। वहीं, सारण में 2 लाख 24 हजार 768 मतदाताओं का नाम कट गय। पहले यहां 31 लाख 27 हजार 451 वोटर्स थे, जो अब घटकर 29 लाख 02 हजार 683 हो गए। 24 जून 2025 से शुरू हुई SIR प्रक्रिया बिहार में 2003 के बाद पहली बार SIR प्रक्रिया चली। इसे 24 जून 2025 को शुरू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य था, फर्जी जैसे विदेशी नागरिकों, दोहराए गए और स्थानांतरित मतदाताओं को सूची से हटाना और नए योग्य मतदाताओं को जोड़ना। इसके तहत 7.24 करोड़ मतदाताओं से फॉर्म लिए गए। SIR का पहला फेज 25 जुलाई 2025 तक पूरा किया गया, जिसमें 99.8% कवरेज हासिल की गई। आंकड़ों के अनुसार, 22 लाख मतदाताओं की मौत हो चुकी है। 36 लाख मतदाता अपने घरों पर नहीं मिले। 7 लाख लोग किसी नई जगह स्थायी निवासी बन चुके हैं।
SC ने आधार को 12वां दस्तावेज मानने के दिए आदेश बिहार के SIR में शुरुआत में 11 दस्तावेज मान्य किए गए थे, लेकिन 8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद आधार नंबर को 12वां दस्तावेज माना गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘आधार पहचान का प्रमाण पत्र है, नागरिकता का नहीं। कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया था कि वोटर की पहचान के लिए आधार को 12वें दस्तावेज के तौर पर माना जाए।’ विपक्ष क्यों कर रहा विरोध विपक्षी का आरोप है कि इस प्रक्रिया से लोगों को वोटिंग के अधिकार से वंचित करने की साजिश हो रही है। विपक्ष का कहना है कि 2003 से आज तक करीब 22 साल में बिहार में कम से कम 5 चुनाव हो चुके हैं, तो क्या वे सारे चुनाव गलत थे। अगर चुनाव आयोग को SIR करना था तो इसकी घोषणा जून के अंत में क्यों की गई। इसका निर्णय कैसे और क्यों लिया गया। अगर मान भी लिया जाए कि SIR की जरूरत है तो इसे बिहार चुनाव के बाद आराम से किया जा सकता था। इतनी हड़बड़ी में इसे करने का फैसला क्यों लिया गया।
