सुप्रीम कोर्ट बोला-रेप विक्टिम के अबॉर्शन पर टाइम लिमिट हटाएं:केंद्र से कहा- अपने कानून में बदलाव करें, अभी 6 महीने तक गर्भपात का नियम

सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की रेप विक्टिम को 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र से कहा कि ऐसे मामलों में अबॉर्शन के लिए टाइम लिमिट से जुड़े कानून में बदलाव करना चाहिए।। CJI ने कहा, ‘कानून ऐसा होना चाहिए, जो समय के साथ बदलता रहे और मौजूदा हालात के अनुसार चले। नाबालिग को जबरन मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में फैसला पीड़ित का ही होना चाहिए।’ सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल को करीब सात महीने प्रेग्नेंट 15 साल की लड़की को अबॉर्शन की इजाजत दी थी। इसके खिलाफ AIIMS ने याचिका लगाई थी। AIIMS ने कहा था कि 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में भ्रूण एक जीव का आकार ले चुका होता है और इस स्टेज पर अबॉर्शन सफल नहीं हो सकता। AIIMS की दलील पर कोर्ट ने कहा कि अगर नाबालिग प्रेग्नेंसी जारी रखती है तो उसे हर दिन मानसिक आघात झेलना पड़ेगा। अभी भारत का कानून रेप मामलों में 6 महीने तक की प्रेग्नेंसी में ही अबॉर्शन की इजाजत देता है। वकील ने बताया था- नाबालिग प्रेग्नेंसी से तनाव में है 24 अप्रैल को सुनवाई में विक्टिम के वकील ने कहा कि इस प्रेग्नेंसी ने नाबालिग को गंभीर मानसिक तनाव दिया है और उसकी पढ़ाई पर भी असर पड़ा है। कोर्ट को बताया गया कि नाबालिग में पहले से ही गंभीर मानसिक तनाव के संकेत दिख रहे हैं। वह आत्महत्या की कोशिश भी कर चुकी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि बच्चे को सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के जरिए गोद दिलाने की व्यवस्था की जा सकती है, जिससे लड़की और उसके परिवार की पहचान सुरक्षित रहे। उन्होंने नाबालिग को आर्थिक मदद की पेशकश भी की। हालांकि कोर्ट ने इस तर्क पर सवाल उठाया और कहा कि हम महिलाओं को अबॉर्शन के बजाय आर्थिक मदद या गोद लेने जैसे विकल्पों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। कोर्ट बोला- महिला को प्रजनन संबंधी फैसले लेने की आजादी कोर्ट ने कहा, ‘किसी महिला, खासकर नाबालिग को इच्छा के खिलाफ प्रेग्नेंसी पूरी करने के लिए मजबूर करना उसके मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। इसलिए उसकी इच्छा का सम्मान करना जरूरी है।’ कोर्ट ने कहा कि प्रजनन संबंधी फैसले लेने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है। इसलिए गोद देने का विकल्प किसी महिला को जबरन बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करने का आधार नहीं बन सकता। SC ने कहा- कोर्ट वहीं करेगा, जो महिला के हित में बेहतर होगा कोर्ट ने कहा कि अगर अदालतें अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने पर जोर देंगी तो महिलाएं अवैध अबॉर्शन सेंटर्स का सहारा लेने या छिपकर गर्भपात कराने को मजबूर हो सकती हैं। इससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बढ़ जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में संवैधानिक अदालतों को यह देखना चाहिए कि गर्भवती महिला के हित में क्या बेहतर है, खासकर तब जब गर्भ स्पष्ट रूप से अनचाहा हो। अंत में कोर्ट ने नाबालिग का AIIMS दिल्ली में सभी जरूरी मेडिकल सावधानियों के साथ अबॉर्शन कराने का निर्देश दिया। अबॉर्शन से जुड़े केस में SC के 3 अहम फैसले 14 साल की नाबालिग रेप विक्टिम का केस: सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में महाराष्ट्र की 14 साल की रेप पीड़ित को 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी में अबॉर्शन करने की इजाजत दे दी। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने नाबालिग के मानसिक और शारीरिक आघात का सही आकलन नहीं किया। SC ने कहा कि नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। 33 साल की 26 हफ्ते की प्रेग्नेंट महिला का केस: 2017 में SC ने कोलकाता की 33 साल की महिला को मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार 26 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की इजाजत दी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि भ्रूण में गंभीर हृदय संबंधी जन्मजात समस्या है, और अगर बच्चा जन्म भी लेता है तो उसके लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना बहुत कम होगी। 10 साल की रेप विक्टिम की याचिका खारिज: 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की 10 साल की रेप पीड़ित की 32 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि इससे मां और बच्चे, दोनों की जान को गंभीर खतरा है। अगस्त 2017 में बच्ची ने ऑपरेशन के जरिए बच्चे को जन्म दिया। ————————- सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद आने पर रोक नहीं: बेहतर ये कि वे घर पर ही इबादत करें, सबरीमाला केस में याचिकाकर्ता की दलील केरलम के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कोर्ट से कहा कि इस्लाम महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने से नहीं रोकता है, लेकिन यह बेहतर है कि वे घर पर ही इबादत करें। पूरी खबर पढ़ें…

More From Author

सऊदी क्राउन प्रिंस का सलाहकार बनना चाहता था एपस्टीन:प्राइवेट आइलैंड पर ‘मस्जिद’ बनवाई, सोने का गुंबद, मक्का से कपड़े और उज्बेकिस्तान से टाइल्स मंगवाए

अडाणी पोर्ट्स का मुनाफा 10% बढ़ा:चौथी तिमाही में यह ₹3,329 करोड़ रहा, रेवेन्यू 26% बढ़कर ₹10,737 करोड़ हुआ; शेयर होल्डर्स को ₹7.50 डिविडेंड मिलेगा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *