फ्यूल क्राइसेस से ट्रांसपोर्ट रुका, मवेशी खा रहे पपीते:किसान बोले- डीजल नहीं, खून जल रहा, जमीन बेचने की नौबत, खड़ी फसल पर चलाया ट्रैक्टर

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के धमधा इलाके में इस बार पपीता किसानों की मेहनत बर्बाद हो गई। पिछले साल अच्छे दाम मिलने के बाद किसानों ने बड़े पैमाने पर पपीते की खेती की थी, लेकिन इस सीजन में बाजार में दाम गिर गए। मौसम की मार पहले ही झेल रहे थे। अब पेट्रोल-डीजल संकट की वजह से ट्रांसपोर्ट रुक गया। पपीते की सप्लाई वेस्ट बंगाल और दिल्ली तक होती थी। वह फसल लोकल मार्केट तक सीमित रह गई। मंडियों तक नहीं पहुंच पाई। इलाके में फूड प्रोससिंग यूनिट भी है, लेकिन किसानों का कहना है कि यूनिट बेहद कम कीमत पर फसल मांग रही थी, जिससे तोड़ाई, मजदूरी और ट्रांसपोर्ट का खर्चा भी नहीं निकलता। मजबूरी में किसानों को बाजार में 4-5 रुपए किलो में पपीता बेचना पड़ा। अब हालत ये है कि डेढ़ रुपए किलो में भी खरीदार नहीं मिल रहे। नई फसल लगाने का समय आ गया, ऐसे में कई किसानों ने तैयार फसल पर ट्रैक्टर चला दिया। कई खेतों में अब मवेशी पपीते खाते नजर आ रहे हैं। एक किसान ने बताया कि नुकसान के कारण 50 लाख का कर्ज हो गया है, अब जमीन बेचने की नौबत है। एक किसान ने कहा कि अंधड़ में बिजली लाइन खराब हुई थी, अभी तक पूरी तरह ठीक नहीं हुई। जनरेटर से सिंचाई करनी पड़ रही है। डीजल नहीं जल रहा, किसानों का खून जल रहा है। दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़िए कैसे धमधा के किसानों पर बाजार, मौसम और डीजल संकट की तिहरी मार पड़ी है… पहले देखिए ये तस्वीरें- फसल खत्म करने को मजबूर किसान दुर्ग जिले के धमधा इलाके के जाताघर्रा गांव में खेत के बीच एक ट्रैक्टर लगातार आगे बढ़ रहा है। ट्रैक्टर के पीछे टूटते जा रहे हैं पपीते के पेड़…कुछ देर पहले तक जिन पेड़ों पर फल लटक रहे थे, अब वही जमीन पर बिखरे पड़े हैं। खेत में कोई शोर नहीं है, सिर्फ ट्रैक्टर की आवाज है और उसके साथ खत्म होती महीनों की मेहनत। ट्रैक्टर लगातार पपीते के पेड़ों को उखाड़ रहा था, लेकिन खेत में कोई किसान नजर नहीं आया। खेत देखकर ही समझ आ रहा था कि हालात कितने खराब हैं। जिन फलों को मंडियों तक पहुंचना था, वे अब मिट्टी में मिल रहे थे। बाजार में गिरे दाम, ट्रांसपोर्ट संकट और लगातार बढ़ते नुकसान ने किसानों को अपनी ही फसल खत्म करने को मजबूर कर दिया है। धमधा इलाके में इस बार पपीता किसानों की हालत ऐसी हो गई है कि कई किसानों ने अपनी तैयार फसल पर ट्रैक्टर चला दिया। कहीं खेतों में पपीते सड़ रहे हैं तो कहीं मवेशी उन्हें खा रहे हैं। कई किसान अब अगली फसल की तैयारी के लिए खेत खाली करने में जुट गए हैं। किसान बोले- अब कोई खरीदार ही नहीं धमधा से पहले ही बसनी गांव में शेरसिंह ठाकुर का खेत दिखाई देता है। खेत में दूर-दूर तक पपीते के पेड़ हैं, लेकिन वहां इंसानों से ज्यादा मवेशी नजर आते हैं। गाय और दूसरे जानवर खेत में घूम-घूमकर पपीते खा रहे हैं। कई फल जमीन पर गिरे हैं, कुछ पेड़ों पर ही सड़ चुके हैं। शेरसिंह बताते हैं कि इस बार सबसे बड़ा झटका उस वक्त लगा जब फसल पश्चिम बंगाल भेजी जानी थी। उसी दौरान डीजल संकट शुरू हो गया। ट्रांसपोर्ट रुक गया और बाहर से गाड़ियां आनी बंद हो गईं। उन्होंने बताया, ‘हमारा माल वेस्ट बंगाल जाता था। वहां बात की तो ट्रांसपोर्ट वालों ने कहा कि डीजल ही नहीं मिल रहा। गाड़ी कैसे भेजें? मजबूरी में 4-5 रुपए किलो में पपीता बेचना पड़ा। अब हालत ये है कि डेढ़ रुपए किलो में भी खरीदार नहीं मिल रहे।’ डीजल नहीं जल रहा, किसानों का खून जल रहा है शेरसिंह ने 12 एकड़ में पपीते की खेती की है। उनका कहना है कि एक एकड़ में 1 लाख से सवा लाख रुपए तक की लागत आती है। इलाके में कई बड़े किसानों ने 100 से 500 एकड़ तक में पपीता लगाया था। पिछले साल अच्छे दाम मिलने के बाद इस बार खेती का रकबा बढ़ गया, लेकिन बाजार ने किसानों को पूरी तरह तोड़ दिया। उन्होंने बताया कि फूड प्रोसेसिंग यूनिट वालों ने भी इस बार फसल नहीं खरीदी। ऐसे में किसानों के सामने कोई विकल्प नहीं बचा। खेतों में तैयार फसल खड़ी रही और धीरे-धीरे खराब होती गई। शेरसिंह अब दूसरी फसल को लेकर भी तनाव में हैं। उनका कहना है कि नुकसान केवल पपीते तक सीमित नहीं है। इसके बाद करेले की फसल पर भी संकट मंडरा रहा है। वजह बिजली कटौती और डीजल संकट है। उन्होंने कहा, ‘अंधड़ में बिजली लाइन खराब हुई थी, अभी तक पूरी तरह ठीक नहीं हुई। जनरेटर से सिंचाई करनी पड़ रही है। ऊपर से डीजल नहीं मिल रहा। डीजल नहीं जल रहा, किसानों का खून जल रहा है।’ पहले मुनाफा देता था पपीता, इस बार कर्ज बढ़ाकर चला गया धमधा इलाके के बरहापुर गांव में किसान देवेन्द्र वर्मा अपने खेत में पपीते के बीच केले की फसल दिखाते हैं। उन्होंने 10 एकड़ में पपीते की खेती की है। खेत में कई जगह फल लगे हैं, लेकिन चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देती है। देवेन्द्र बताते हैं कि पहले पपीते की फसल से अच्छा मुनाफा हो जाता था। खासकर रमजान के समय बाजार में पपीते की डिमांड बढ़ती थी। हर साल 30 से 35 रुपए किलो तक रेट मिल जाता था, लेकिन इस बार पूरा बाजार टूट गया। उन्होंने कहा, ‘इस बार 12-15 रुपए किलो में ही माल बिक पाया। बाहर सप्लाई करने के लिए लोडिंग ही नहीं हो रही। पहले वेस्ट बंगाल और दिल्ली तक माल जाता था, लेकिन अब सिर्फ लोकल मार्केट तक सीमित हो गया है।’ 50 लाख का कर्ज हो गया, अब जमीन बेचने की नौबत देवेन्द्र वर्मा बताते हैं कि पपीते की खेती पूरी तरह कर्ज के भरोसे चल रही थी। खेती बढ़ाने के लिए उन्होंने लोन लिया था। अब नुकसान इतना बढ़ गया है कि हालात खराब हो चुके हैं। उन्होंने कहा, ‘पहले और अब का मिलाकर करीब 50 लाख रुपए का कर्ज हो गया है। अब जमीन बेचने की नौबत आ गई है।’ देवेन्द्र बताते हैं कि इलाके में फूड प्रोसेसिंग यूनिट होने के बावजूद किसानों को राहत नहीं मिली। जब बाजार में पपीता 8-9 रुपए किलो बिक रहा था, तब प्रोसेसिंग यूनिट वाले 4 रुपए किलो में माल मांग रहे थे। उन्होंने कहा, ‘इतने में तो तोड़ाई, मजदूरी और ट्रांसपोर्ट का खर्चा भी नहीं निकल सकता।’ माल खेत में सड़ गया, अब दूसरी फसल के लिए खेत खाली करेंगे धमधा में लीज पर जमीन लेकर खेती कर रहे नईम अहमद भी इस बार भारी नुकसान झेल रहे हैं। उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर 20 एकड़ में पपीते की खेती की थी। नईम बताते हैं कि एक एकड़ में करीब डेढ़ लाख रुपए तक खर्च आता है। इस बार पूरी उम्मीद थी कि रमजान सीजन में अच्छे दाम मिलेंगे, लेकिन उसी दौरान पेट्रोल-डीजल संकट शुरू हो गया। उन्होंने कहा, ‘जिस समय सबसे ज्यादा भाव मिलता है, उसी समय माल बाहर नहीं जा पाया। खेत में ही फसल खराब होने लगी। इस बार तो लागत निकालना भी मुश्किल हो गया।’ खेतों में सिर्फ नुकसान की कहानी बची धमधा इलाके में बसनी, करेली, कन्हारपुरी, परसुली, बरहापुर, जाताघर्रा, अछोली, बरहापुर, जाताघर्रा, अछोली, लालपुर और परसुली गांव में भी कई किसानों ने पपीते की खेती की है। सबकी कहानी एक जैसी ही है। इस समय कई खेतों का दृश्य लगभग एक जैसा है। कहीं ट्रैक्टर से फसल खत्म की जा रही है, कहीं मवेशी पपीते खा रहे हैं और कहीं किसान अगली खेती की तैयारी में लगे हैं। पिछले साल जिन खेतों ने किसानों को उम्मीद दी थी, वही खेत इस बार कर्ज, नुकसान और चिंता की वजह बन गए हैं। किसानों का कहना है कि अगर ट्रांसपोर्ट नहीं रुका होता और बाजार में सही दाम मिल जाते, तो शायद हालात इतने खराब नहीं होते। लेकिन फिलहाल धमधा के खेतों में पपीते से ज्यादा दिखाई दे रही है किसानों की बेबसी। ………………….. इससे संबंधित ये खबर भी पढ़ें… किसानों ने 500 एकड़ पपीता फसल पर चलाया ट्रैक्टर, VIDEO: डीजल-संकट से ट्रांसपोर्टिंग बंद, आवक बढ़ने से भाव गिरे, नहीं मिले खरीदार, फसल की बर्बाद छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में इस बार पपीता किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है। पिछले साल अच्छे दाम मिलने के बाद किसानों ने बड़े पैमाने पर पपीते की खेती की थी, लेकिन इस साल बाजार में पपीते के दाम गिर गए। वहीं, डीजल संकट ने किसानों की मुश्किल और बढ़ा दी। पढ़ें पूरी खबर

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