सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने कहा कि इसके प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर की है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। UGC ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को नोटिफाई किया था। इनका देशभर में विरोध हो रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही नियमों का ड्राफ्ट फिर से तैयार करने का निर्देश दिया। CJI सूर्यकांत ने केंद्र से पूछा- हमने जातिविहीन समाज की दिशा में कितना कुछ हासिल किया है। क्या अब हम उल्टी दिशा में चल रहे हैं? UGC के नए कानून का नाम है- ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026।’ इसके तहत कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए कई निर्देश दिए गए थे। नए नियमों के तहत, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाने का निर्देश दिया गया। ये टीमें SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों को देखेंगी। सरकार का कहना है कि ये बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं। हालांकि, सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि UGC ने जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और इससे कॉलेजों में अराजकता पैदा होगी। सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि नए नियमों में सवर्ण छात्र ‘स्वाभाविक अपराधी’ बना दिए गए हैं। इनसे उनके खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा। कोर्ट रूम LIVE एडवोकेट विष्णु शंकर जैन: हम नियम 3(C) को चुनौती दे रहे हैं, जो जाति आधारित भेदभाव को परिभाषित करता है। एडवोकेट विष्णु शंकर जैन: यह पूरी तरह से संकीर्ण है! ‘भेदभाव’ की परिभाषा व्यापक है। सामान्य वर्ग के सदस्यों के मामले में…जब धारा 3(e) पहले से ही लागू है, तो धारा 3(C) की क्या आवश्यकता है? इसमें मान लिया गया है कि केवल एक खास वर्ग ही जाति आधारित भेदभाव का सामना करता है। CJI: हम केवल संवैधानिकता और वैधता की सीमा पर ही जांच कर रहे हैं। CJI: मान लीजिए कि दक्षिण भारत या उत्तर पूर्व का कोई छात्र उत्तर भारत में एडमिशन लेता है। ऐसे छात्र के खिलाफ कुछ व्यंग्यात्मक, अपमानजनक टिप्पणियां की जाती हैं… यहां तक कि टिप्पणी करने वालों की पहचान भी अज्ञात है… क्या यह प्रावधान इस मुद्दे का समाधान करेगा? एक अन्य एडवोकेट: रैगिंग भी एक मुद्दा है, जब मैं नया स्टूडेंट हूं, तो मेरी शक्ल-सूरत से पता चल जाएगा कि मैं नया हूं। अगर मैं विरोध करता हूं और शिकायत करने की हिम्मत करता हूं, तो मुझ पर क्रॉस-केस चलाया जाएगा। आरोप जाति आधारित भेदभाव का होगा।
CJI: क्या इस नियम के तहत आपकी रैगिंग की शिकायत पर विचार किया जाएगा?
वकील: उन्होंने रैगिंग की परिभाषा तक नहीं दी है। इस नए छात्र को जेल जाना पड़ेगा। कॉलेज के पहले ही महीने में। इस नियम से रैगिंग की परिभाषा क्यों हटा दी गई? यह सिर्फ जातिगत मुद्दों को ही संबोधित करता है। सवाल-1: UGC ने कॉलेज में जातीय भेदभाव को लेकर नए नियम क्यों बनाए? जवाब: 17 दिसंबर 2012 से UGC से मान्यता प्राप्त सभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में जातीय भेदभाव रोकने के लिए कुछ नियम लागू किए गए थे। ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस’ नाम के ये नियम सिर्फ सुझाव और जागरूकता के लिए थे। इनमें कोई सजा या अनिवार्यता नहीं थी। 17 जनवरी 2016 को हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट रोहित वेमुला ने जातीय उत्पीड़न के चलते आत्महत्या कर ली। इसी तरह 22 मई 2019 को महाराष्ट्र में दलित डॉक्टर पायल तडवी ने भी आत्महत्या कर ली। 29 अगस्त 2019 को रोहित वेमुला और पायल तडवी के परिजनों ने कॉलेज में जातीय भेदभाव के नियमों को सख्त बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की। इसी साल IIT ने एक स्टडी की, जिसमें पाया गया कि ‘ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों के 75% छात्र कॉलेज में भेदभाव का सामना करते हैं।’ जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने UGC को जातीय भेदभाव की शिकायतों का डेटा इकठ्ठा करने को कहा, साथ ही नए नियम बनाने का निर्देश दिया। फरवरी 2025 में फीडबैक लेने के लिए इन नए नियमों का एक ड्राफ्ट जारी किया गया। ‘ऑल इंडिया OBC स्टूडेंट यूनियन’ का कहना था कि ड्राफ्ट के तहत यूनिवर्सिटीज में जातिगत भेदभाव की परिभाषा में OBC को शामिल नहीं किया गया है, साथ ही कॉलेज में भेदभाव के मामलों पर कार्रवाई के लिए जो इक्वलिटी कमेटी बनाई जानी हैं, उनमें भी OBC मेंबर शामिल करने का प्रावधान नहीं है। ड्राफ्ट में जातीय भेदभाव की झूठी शिकायत करने पर दंड का प्रावधान था। इस पर कहा गया कि इससे भेदभाव का सामना कर रहे स्टूडेंट्स शिकायत करने से डरेंगे। ड्राफ्ट में जातीय भेदभाव की कोई स्पष्ट परिभाषा भी नहीं थी। संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा संबंधी मामलों की संसदीय समिति ने ड्राफ्ट की समीक्षा करने के बाद इसे 8 दिसंबर 2025 को केंद्र सरकार को सौंपा। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह इस समिति के चेयरमैन थे। समिति ने UGC को अपनी सिफारिशें दीं, जिनमें कहा गया कि भेदभाव वाले नियम की परिभाषा और इक्विटी कमेटी में OBC को भी शामिल किया जाए। इसके बाद UGC ने ड्राफ्ट में कई बदलाव करके 13 जनवरी 2026 को नए नियम नोटिफाई कर दिए। 15 जनवरी से ये नियम UGC से मान्यता प्राप्त सभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में लागू हो गए हैं। सवाल-2: इन नए नियमों के तहत क्या-क्या बड़े बदलाव हुए हैं? जवाब: प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशंस 2026 में 3 बड़े बदलाव हुए हैं… 1. जातीय भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा दी गई इस परिभाषा में कहा गया है, ‘जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, पैदाइश के स्थान, विकलांगता के आधार पर कोई भी अनुचित या पक्षपाती व्यवहार, जो पढ़ाई में बराबरी में बाधा बने या मानव गरिमा के खिलाफ हो, उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा।’ जबकि ड्राफ्ट में जातीय भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा नहीं थी। 2. परिभाषा में OBC को भी शामिल किया गया इस परिभाषा में ‘SC/ST के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC छात्रों को शामिल किया गया है। कहा गया है कि इनके खिलाफ किसी भी अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार को जाति-आधारित भेदभाव माना जाएगा। जबकि ड्राफ्ट में OBC को शामिल नहीं किया गया था। 3. झूठी शिकायत करने पर सजा का प्रावधान हटाया गया ड्राफ्ट में झूठी शिकायतों को कम करने के लिए प्रावधान था। इसमें कहा गया था कि अगर झूठी या जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी के खिलाफ शिकायत की गई, तो शिकायत करने वाले को आर्थिक दंड या कॉलेज से सस्पेंड भी किया जा सकता है। अब लागू हुए फाइनल नियमों से ये प्रावधान हटा लिया गया है। सवाल-3: जातीय भेदभाव की शिकायत पर नए नियमों के तहत कार्रवाई कैसे होगी? जवाब: नए नियमों में जातीय भेदभाव की शिकायत पर कार्रवाई के कुछ प्रावधान हैं… कॉलेजों में ईक्वल अपॉर्च्यूनिटी सेंटर यानी EOC बनेंगे। ये कॉलेज कैंपस में पिछड़े और वंचित लोगों को शैक्षिक, वित्तीय और दूसरे मामलों में सलाह देंगे और उनके साथ भेदभाव से जुड़ी शिकायतों का समाधान करेंगे। कॉलेज जातीय भेदभाव को रोकने के लिए समाज, मीडिया, जिला प्रशासन और NGO, स्टूडेंट्स और अभिभावकों के साथ मिलकर काम करेगा और कानूनी मदद के लिए जिले और राज्य की लीगल अथॉरिटीज यानी कोर्ट्स का सहयोग लेगा। EOC के तहत हर कॉलेज को एक इक्वलिटी कमेटी यानी समता समिति बनानी होगी। इसके अध्यक्ष कॉलेज के प्रमुख होंगे। इस कमेटी में SC/ST, OBC, विकलांग, महिलाएं शामिल होंगी। इनका कार्यकाल दो साल का होगा। विशेष आमंत्रित सदस्यों का कार्यकाल एक साल का होगा। कॉलेज में एक ‘इक्विटी स्क्वाड’ नाम की छोटी संस्था भी बनाई जाएगी, जिसका काम कॉलेज में निगरानी करना और भेदभाव को रोकना होगा। भेदभाव की शिकायत आने पर इक्वलिटी कमेटी को 24 घंटे के अंदर बैठक करके शुरुआती कार्रवाई करनी होगी और 15 दिन के अंदर कॉलेज के प्रमुख को इसकी रिपोर्ट देनी होगी। कॉलेज के प्रमुख को 7 दिनों के अंदर आगे की कार्रवाई शुरू करनी होगी। EOC को हर 6 महीने में कॉलेज के प्रमुख को अपने कामकाज की रिपोर्ट देनी होगी। जबकि जातीय भेदभाव को लेकर कॉलेजों को UGC को सालाना रिपोर्ट देनी होगी। इसके अलावा UGC राष्ट्रीय स्तर की एक निगरानी कमेटी भी बनाएगा। नियमों का उल्लंघन करने वाले कॉलेज UGC की योजनाओं से बाहर किए जा सकते हैं। उनके डिग्री प्रोग्राम, डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम या ऑनलाइन प्रोग्राम पर रोक लगाई जा सकती है और UGC की मान्यता भी रद्द की जा सकती है। सजा का यह नियम ऐसा है कि UGC के रूल्स अब सिर्फ सलाह भर नहीं, बल्कि एन्फोर्समेंट की कैटेगरी में आ जाते हैं। सवाल 4: अब जो नए नियम लागू हुए हैं, उनका विरोध क्यों किया जा रहा? जवाब: UGC के इन नए नियमों के लागू होने के बाद सोशल मीडिया पर #UGCRollback और #ShameOnUGC जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। विरोध करने वाले लोग नियमों में 4 तरह की खामियां बता रहे हैं… 1. भेदभाव की परिभाषा सवर्ण छात्रों के खिलाफ नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा में SC/ST/OBC, महिलाओं, विकलांगों को शामिल किया गया है, जबकि सवर्ण या जनरल कैटेगरी के छात्रों को भेदभाव से पीड़ित लोगों के दायरे में शामिल नहीं किया गया है। इससे सवर्ण छात्र ‘स्वाभाविक अपराधी’ की तरह देखे जाएंगे। नियमों के मुताबिक, वे भेदभाव के आरोपी तो हो सकते हैं, लेकिन पीड़ित नहीं हो सकते। एक यूजर ने लिखा, ‘इन नियमों में सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि पीड़ित और आरोपी की जाति पहले से तय कर दी गई है। पीड़ित हमेशा SC/ST और OBC समुदाय से होगा, जबकि अपराधी हमेशा जनरल कास्ट का होगा।’ गरुण प्रकाशन के फाउंडर और CEO प्रोफेसर संक्रांत सानू लिखते हैं, ‘ये अकादमिक नियमों के खिलाफ है। इससे कास्ट पॉलिटिक्स को बढ़ावा मिलेगा।’ RTI एक्टिविस्ट प्रोफेसर नेहा दास के मुताबिक, ‘ये गाइडलाइंस जन्म के आधार पर ही उत्पीड़क या उत्पीड़ित का ठप्पा लगाती हैं। इससे कैंपस में टकराव बढ़ेगा।’ 2. झूठी शिकायत करने पर कोई सजा नहीं है झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कोई जुर्माना या अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं है। कोई शिकायत आने पर 24 घंटे के अंदर शुरुआती कार्रवाई करने का नियम है। इससे सवर्ण स्टूडेंट्स और फैकल्टीज के खिलाफ झूठी शिकायतें बढ़ सकती हैं। 3. इक्विटी कमेटी में जनरल कैटेगरी का कोई मेंबर नहीं EOC और इक्विटी कमेटी में जनरल कमेटी के मेंबर रखने का प्रावधान नहीं है। इससे जातीय भेदभाव के खिलाफ कार्रवाई करने वाले सिस्टम में सवर्ण छात्रों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा और कमेटी एकतरफा तरीके से काम करेंगी। 4. संस्थान कार्रवाई के डर से सही निर्णय नहीं ले पाएंगे भेदभाव रोकने के नए नियमों का उल्लंघन होने पर कॉलेज की ग्रांट रोकने और मान्यता रद्द करने जैसी सख्त सजा का प्रावधान है। लोगों का कहना है कि इससे कॉलेज इन सजा के डर से मेरिट के आधार पर सही फैसला नहीं ले पाएंगे। इसके अलावा विरोध कर रहे लोग इन नियमों को 1956 के UGC एक्ट के दायरे से बाहर बता रहे हैं। दरअसल, UCG ने 1956 के UGC एक्ट के आर्टिकल 26 के तहत नए नियम बनाए हैं। विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि UGC एक्ट का फोकस अकादमिक मानकों और यूनिवर्सिटीज को मिलने वाले अनुदान वगैरह पर है, न कि सामाजिक या जातीय भेदभाव पर। एक्ट में इसका कोई जिक्र नहीं है, इसलिए नए नियम एक्ट के दायरे से बाहर हैं। दरअसल, UGC एक्ट में सीधे तौर पर जाति, जातीय भेदभाव, उत्पीड़न या भेदभाव रोकने के नियमों का कोई जिक्र नहीं है। इसके आर्टिकल 12 में हायर एजुकेशन के संस्थानों में स्टैंडर्ड तय करने की बात कही गई है। हालांकि आर्टिकल 26 की धारा 1 के तहत UGC को शिक्षा के मानकों से जुड़े नियम बनाने की ताकत मिली है। सवाल-5: क्या सरकार इन नियमों को वापस ले सकती है? जवाब: UGC रेगुलेशन के खिलाफ एक ईमेल कैंपेन चलाया जा रहा है। इसके तहत UGC और शिक्षा मंत्रालय को सामूहिक रूप से ईमेल भेजकर कहा जाएगा कि वह इन रेगुलेशंस को वापस लें। UGC के पूर्व चेयरमैन रहे एम जगदीश कुमार का कहना है कि ये नियम हायर एजुकेशन में बराबरी लाने और भेदभाव खत्म करने के लिए बनाए गए हैं और इनका मकसद सभी छात्रों के हितों की रक्षा करना है। वहीं UGC के मौजूदा चेयरमैन विनीत जोशी ने इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। वहीं बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि मोदी सरकार में सवर्ण समाज को 10% आरक्षण मिला है और UGC के नियम संविधान के आर्टिकल 14 के मुताबिक हैं, इसलिए किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव का सवाल नहीं उठता। तमिलनाडु CM ने UGC के नए नियमों का समर्थन किया इधर, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने UGC के नए नियमों का समर्थन करते हुए केंद्र की सराहना की है। स्टालिन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा- UGC नियम 2026 भले ही देर से उठाया गया कदम है लेकिन भेदभाव और उदासीनता में डूबी हाइअर एजुकेशन सिस्टम में सुधार की दिशा में अच्छा फैसला है। बृजभूषण शरण बोले- एकतरफा कानून पर विचार की जरूरत भाजपा नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने UGC बिल के नए प्रावधानों का विरोध किया है। उन्होंने इसे समाज को बांटने वाला नियम बताया। उन्होंने कहा- एक समुदाय को शोषित और दूसरे को पीड़ित माना जा रहा है, जबकि कमेटी में शोषित समुदाय का कोई प्रतिनिधि नहीं है। बृजभूषण ने कहा- मुझे नहीं पता कि यह कानून किसने बनाया, लेकिन इससे समाज में तनाव पैदा हो रहा है। यह केवल उच्च जाति के समुदाय का दर्द नहीं है; यह सभी समुदायों का दर्द है। OBC और दलित समुदायों के जो बच्चे हालात को समझते हैं, उन्हें इसके विरोध में आगे आना चाहिए।
