सड़क किनारे हजारों ताले और घड़ियां बंधी हुई हैं। आश्रम के मुख्य द्वार पर लोग माथा टेक रहे हैं। कोई हाथ में मेडिकल रिपोर्ट लिए खड़ा है, कोई परिवार के साथ हवन की तैयारी कर रहा है, तो कोई दूर-दराज से सिर्फ दर्शन करने पहुंचा है। धमतरी रोड पर स्थित मातंगी धाम की तस्वीर किसी सामान्य मंदिर जैसी नहीं लगती। यहां आने वाले ज्यादातर लोगों की जुबान पर एक ही बात सुनाई देती है, “समस्या लेकर आए थे, समाधान की उम्मीद लेकर लौट रहे हैं।” मां मातंगी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी कुल देवी हैं। 5 साल पहले शुरू हुए इस धाम ने कम समय में अपनी अलग पहचान बनाई है। इस आश्रम में लोगों की गहरी आस्था है। आश्रम प्रबंधन का कहना है कि यहां छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के कई राज्यों और कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, भूटान समेत दूसरे देशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस रिपोर्ट में जानिए मातंगी धाम की कहानी, यहां की मान्यताएं, आश्रम से जुड़े दावे और श्रद्धालुओं का अनुभव… पहले देखिए ये तस्वीरें- पहले जानिए, मां मातंगी कौन हैं? धाम के प्रेमासाईं महाराज बताते हैं कि मां मातंगी को दस महाविद्याओं में नौवीं महाविद्या माना जाता है। उन्हें वाणी, संगीत, कला और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। गुजरात के महेसाणा जिले के मोढेरा में मां मातंगी का प्राचीन मंदिर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुलदेवी भी मां मातंगी हैं। जहां प्रधानमंत्री मोदी दर्शन करने के लिए जाते रहते हैं। आश्रम प्रबंधन के अनुसार, संस्था का पहला मातंगी धाम ओडिशा में बना था, जबकि दूसरा धाम छत्तीसगढ़ में स्थापित किया गया। बीमारियों से राहत मिलने के कई दावे आश्रम में बातचीत के दौरान कई श्रद्धालुओं ने अपने अनुभव शेयर किए। प्रेमासाईं महाराज का दावा है कि सालों से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे कई लोग यहां आने के बाद स्वास्थ्य लाभ मिलने की बात बताते हैं। इस धाम में लोग अपनी आर्थिक, शारीरिक और पारिवारिक समस्याओं को लेकर आते हैं। लोगों को समस्याओं से भी मुक्ति मिलती है। ये सिर्फ मातंगी माता के आशीर्वाद से संभव होता है। ऐसे ही एक उदाहरण के तौर पर उन्होंने बिहार के बेगूसराय की मौसमी कुमारी का जिक्र किया। उनके अनुसार, कुछ साल पहले वह चलने-फिरने में असमर्थ थीं और परिवार उन्हें गोद में उठाकर आश्रम लाया था। आश्रम में पूजा-अनुष्ठान के बाद उनकी स्थिति में सुधार हुआ। दैनिक भास्कर ने बिहार के मौसमी कुमारी से बात की। उन्होंने बताया कि इलाज के साथ यहां आने के बाद उनकी सेहत में धीरे-धीरे सुधार हुआ और अब उन्हें पहले जैसी परेशानी नहीं है। नेपाल से आए सुरेंद्र लिंबू ने बताया कि पेट की समस्या के इलाज के दौरान उन्हें आश्रम के बारे में जानकारी मिली। उनका कहना है कि यहां आने और पूजा-अनुष्ठान के बाद उन्हें राहत महसूस हुई। बनारस की छिप्रा सिंह ने कहा कि पारिवारिक परेशानियों के बीच हवन-पूजन कराया, जिससे मानसिक संतोष मिला। वहीं महाराष्ट्र से आई सुनीता ने कहा कि वह कई बार मातंगी धाम आ चुकी हैं और उनकी आस्था लगातार बढ़ी है। राजस्थान के जालौर से आए नाथू सिंह ने बताया कि वह आश्रम से 2023 से जुड़े हैं। वह यहां पर 17-18 बार आ चुके हैं। उनकी पत्नी लंबे समय से बीमार थी। कहीं राहत नहीं मिली उसके बाद वह मातंगी आश्रम आए जहां उनका समाधान हुआ। प्रेमासाईं महाराज ने महासमुंद के एक बुजुर्ग का भी उदाहरण दिया, जिनके बारे में उनका दावा है कि लंबे समय से मानसिक परेशानी के बाद आश्रम आने से उन्हें लाभ मिला। ताला और जंजीर बांधने की परंपरा क्यों है? मातंगी धाम की सबसे अलग पहचान मुख्य द्वार पर बंधे हजारों ताले और जंजीरें हैं। प्रेमासाईं महाराज बताते हैं कि श्रद्धालु 31 बार मंत्र जाप करने के बाद अपनी मनोकामना या परेशानी को प्रतीकात्मक रूप से ताले में बांध देते हैं। ताले की एक चाबी अपने पास रखते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इससे उनकी परेशानियां पीछे छूट जाती हैं। यही वजह है कि आश्रम पहुंचने वाला लगभग हर नया व्यक्ति सबसे पहले इन तालों के बारे में जानना चाहता है। घड़ियां क्यों बांधते हैं श्रद्धालु आश्रम के प्रवेश द्वार पर बड़ी संख्या में घड़ियां भी बंधी दिखाई देती हैं। आश्रम प्रबंधन का कहना है कि कई श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने की कामना से यहां घड़ी बांधते हैं। कुछ श्रद्धालुओं का दावा है कि रात के समय इन घड़ियों की सुइयों की चाल में बदलाव या अन्य असामान्य घटनाएं महसूस होती हैं। प्रेमासाईं महाराज इसे माता की कृपा और धार्मिक मान्यता से जोड़ते हैं। हालांकि इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी है। दरबार पूरी तरह निशुल्क आश्रम की सबसे ज्यादा चर्चा उसके दिव्य दरबार को लेकर होती है। प्रेमासाईं महाराज का कहना है कि यहां लगने वाला दरबार पूरी तरह निशुल्क है। इसमें लोग अपनी समस्याएं लेकर आते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से समाधान बताया जाता है। अलग-अलग राज्यों में भी ऐसे निशुल्क दरबार लगाए जाते हैं। मां मातंगी की पूजा में व्रत क्यों नहीं रखा जाता? आमतौर पर देवी पूजा में व्रत का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन मातंगी धाम में इसकी परंपरा अलग है। प्रेमासाईं महाराज बताते हैं कि धार्मिक मान्यता के अनुसार मां मातंगी अपने भक्तों को भूखा नहीं देखना चाहतीं। इसी कारण यहां होने वाले अधिकांश अनुष्ठानों में उपवास रखने की अनिवार्यता नहीं है। धर्मांतरण और सनातन पर क्या कहते हैं महाराज आश्रम की स्थापना के उद्देश्य पर प्रेमासाईं महाराज का कहना है कि सनातनी साधना और तंत्र विद्या के लिए दूसरे धर्मो का सहारा ले रहे हैं जहां उनका शोषण और धर्मांतरण होता है। हिंदू धर्म में भी साधना और तंत्र के माध्यम से सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। उनका कहना है कि इसी सोच के साथ आश्रम कई क्षेत्रों में धार्मिक आयोजन करता है। कुछ स्थानों पर ऐसे आयोजनों के माध्यम से घर वापसी के कार्यक्रम भी किए गए हैं। आस्था, अनुभव और सवाल मातंगी धाम आज उन धार्मिक स्थलों में शामिल हो चुका है, जहां हर दिन बड़ी संख्या में लोग अलग-अलग उम्मीदों के साथ पहुंचते हैं। यहां आस्था से जुड़े कई दावे किए जाते हैं, जिनमें से कई की स्वतंत्र पुष्टि संभव नहीं है। फिर भी यह धाम हजारों श्रद्धालुओं के लिए विश्वास का केंद्र बन चुका है। शायद यही वजह है कि पांच साल बाद भी यहां आने वालों की भीड़ लगातार बढ़ रही है।
