उच्च शिक्षा पाकर अमूमन युवा शहरों की तरफ भागते हैं। या किसी दफ्तर में नौकरी तलाशते हैं। लेकिन आमाबेड़ा के ग्राम चिचगांव निवासी सोनूराम ध्रुव की सोच अलग थी। उन्होंने अर्थशास्त्र में एमए किया। नौकरी के पीछे नहीं भागे। अपनी माटी को ही आजीविका का जरिया बनाया। कभी नक्सलवाद से प्रभावित रहे इस अंचल में आज सोनूराम ने मेहनत और वैज्ञानिक सोच से जैविक खेती की नई इबारत लिख दी है। इसे देखने दूर-दूर से लोग आ रहे हैं। 10 एकड़ खेत में विविध फसलें उगाकर हर साल 8 लाख से अधिक शुद्ध आय अर्जित कर रहे हैं। सोनूराम बताते हैं। उनका सफर आसान नहीं था। 2015 में पहली बार जैविक खेती शुरू की। तब आसपास के लोग हंसते थे। रासायनिक खादों के दौर में बिना यूरिया-डीएपी खेती करना बड़ा जोखिम था। खेत में टपक सिंचाई तकनीक अपनाई। जल प्रबंधन सुधारा। इससे कम पानी में भी फसलों को पूरा पोषण मिलने लगा। ताराचंद बेलजी तकनीक का उपयोग किया। यह पूरी तरह वृक्ष आयुर्वेद और प्राकृतिक खेती पर आधारित है। खेतों को भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल यानी “पंचमहाभूत” के सिद्धांतों से जोड़ा। उनका मानना है। जब हम प्रकृति के इन पांच तत्वों के साथ संतुलन बनाकर चलते हैं, तो मिट्टी की उर्वरा शक्ति अपने आप लौट आती है। जमीन की सेहत सुधारने के लिए अनोखा प्रयोग किया। मिट्टी की जांच में कार्बन की कमी पाई। खेत में तिल की फसल उगाई। फसल कटने के बाद अवशेषों को खेत की मिट्टी में ही मिला दिया। इससे जमीन का जैविक कार्बन बढ़ा। पीएच स्तर संतुलित हो गया। घर की प्रयोगशाला में बनाते हैं कीटनाशक और खाद बाजार से महंगी दवा-खाद खरीदना बंद किया। खेत और आसपास मिलने वाले स्थानीय संसाधनों जैसे नींबू, पपीता, हर्रा और औषधीय पौधों से जैविक घोल और जैविक कीटनाशक तैयार करते हैं। बीज से लेकर खाद तक सब कुछ घर में तैयार होने से लागत कम हो गई। मुनाफा बढ़ गया। ₹150 किलो की दर से हाथों-हाथ बिकता है चावल 10 एकड़ भूमि पर समन्वित कृषि कर रहे हैं। 4 एकड़ में पूरी तरह जैविक चिन्नौर धान उगाते हैं। औषधीय गुणों से भरपूर ब्लैक राइस की खेती करते हैं। खरीफ में प्रति एकड़ 20 क्विंटल उत्पादन मिलता है। बाजार में चिन्नौर चावल की मांग इतनी है कि ₹150 प्रति किलोग्राम की दर से हाथों-हाथ बिकता है। धान के अलावा गेहूं, उड़द, कुल्थी, रागी, काली हल्दी, आम की फसल लेते हैं। इस साल प्रयोग के तौर पर काली मिर्च के 400 पौधे रोपे। इनमें फल आना शुरू हो गया है। खेती के साथ गौ-पालन शुरू किया। इससे मिलने वाला गोबर-गोमूत्र खेती के लिए अमृत का काम करता है।
किसानों के लिए सीख, लागत घटाएं, प्रकृति बचाएं सोनूराम कहते हैं। रासायनिक खाद जमीन को बंजर बना रही है। खेती की लागत भी बढ़ा रही है। स्थानीय संसाधनों से खुद जैविक खाद तैयार कर किसान कर्ज के दलदल से बाहर निकल सकते हैं। सिर्फ एक फसल (पारंपरिक धान) पर निर्भर रहने के बजाय चिन्नौर धान, रागी, काली मिर्च, काली हल्दी जैसी नकदी फसलें लेनी चाहिए। जैविक खेती ही भारत की प्राचीन और सबसे उत्कृष्ट कृषि पद्धति है। देश का किसान इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ दोबारा अपना ले। तब हर गांव आत्मनिर्भर बन सकता है। इनसे संपर्क करिए…
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