छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले की पद्मश्री सम्मानित सोशल वर्कर फूलबासन बाई यादव का कहना है कि किताबों को पढ़ने से कहीं ज्यादा मुश्किल जिंदगी को गढ़ना है। उनके मुताबिक, विपरीत परिस्थितियां इंसान को मजबूर और लाचार भले बनाती हैं, लेकिन वही परिस्थितियां उसे संघर्ष करना और मजबूत बनना भी सिखाती हैं। दैनिक भास्कर से एक खास बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी जिंदगी के कई संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक किस्से साझा किए। अपने गरीबी के दिनों को याद करते हुए फूलबासन बाई भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि एक दौर ऐसा भी था जब पहनने की साड़ियों में 50 से ज्यादा छेद हुआ करते थे। गरीबी और तंगहाली से इस कदर परेशान हो चुकी थीं कि एक दिन अपने बच्चों के साथ सुसाइड करने के इरादे से रेलवे ट्रैक तक पहुंच गईं, लेकिन वहां उनकी छोटी-छोटी बेटियों की मासूमियत ने उन्हें रोक लिया। बेटियों से मिली उसी प्रेरणा के बाद उन्होंने जिंदगी से हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में फूलबासन बाई यादव ने अपनी जिंदगी के कई संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक किस्से शेयर किए:- सवालः सफर का वो सबसे अंधेरा दिन कौन सा था, जब हिम्मत टूटने लगी थी? फिर खुद को दोबारा कैसे खड़ा किया जवाब: कम उम्र में मेरी शादी हो गई, तब मैंने गरीबी को बहुत नजदीक से देखा है। मैं जब 7 साल की थी तो हम झोपड़ी में रहते थे। मैं होटल में बर्तन धोती थी। गाय-बकरी चराती थी। मां एक साड़ी को दो टुकड़ा कर पहनाती थी। इन सबके बीच 10 साल की उम्र में शादी हो गई। दुनिया बहुत बड़ी है समाज बड़ा है, लेकिन गरीब का कोई नहीं होता। 4 बच्चे हुए, जिन्हें भर पेट खाना भी नहीं खिला पाती थी। एक दिन ऐसा आया कि बच्चों को लेकर आत्महत्या करने के लिए निकल गई थी। सवाल: समाज सेवा करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली? जवाब: गरीबी इतनी थी कि मेरा 2 साल का बेटा भूख के कारण ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था। एक मां अपने बच्चों के लिए हर दर्द सह लेती है, लेकिन एक समय ऐसा आया जब मुझे लगा कि अब कोई उम्मीद नहीं बची है। मैं अपने बच्चों को लेकर रेलवे ट्रैक के पास एक पेड़ के नीचे खड़ी थी और ट्रेन का इंतजार कर रही थी। मेरे मन में विचार आ गया था कि मैं अपने बच्चों को ट्रेन के सामने फेंक दूं, तभी मेरी दोनों बेटियों ने मेरे पैर पकड़कर रोना शुरू कर दिया। उनकी मासूम पुकार ने मेरी अंतरात्मा को झकझोर दिया। उसी पल मेरे मन में ख्याल आया कि क्या मैं ही दुनिया की अकेली गरीब मां हूं? इस दुनिया में न जाने कितने गरीब मां-बाप हैं, जो अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं। उसी पल मैंने तय कर लिया कि हार नहीं मानूंगी। मैंने समाज सेवा के जरिए गरीबी से लड़ने और जरूरतमंद महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया। इसी सोच के साथ 11 महिलाओं को जोड़कर अपने सामाजिक कार्य की शुरुआत की। सवाल: क्या कोई ऐसा सपना है, जो पद्मश्री मिलने के बाद भी अधूरा है? जवाब: महिलाओं को जोड़कर आत्मनिर्भर बनाना है। 11 महिलाओं से शुरू हुआ मेरा काम आज करीब 2 लाख महिलाओं तक पहुंच गया है। बचत, स्वरोजगार, जैविक खेती, जल संरक्षण और सामाजिक जागरूकता से जुड़े काम हैं, जिस पर लगातार काम कर रही हूं। समाज में महिलाओं को आत्म निर्भर बनाने लगातार काम करती रहूंगी। सवाल: कैसे शुरू हुआ समाज सेवा का सफर जवाब: जब मुझे बेटियों से समाज सेवा की प्रेरणा मिली, तब मैंने 11 महिलाओं को जोड़कर 2001 में स्वयं सहायता समूह शुरू की, तब 200 और दो मुट्ठी चावल से काम शुरू किया। इसके बाद अब केवल राजनांदगांव जिले में 2 लाख महिलाएं जुड़ गई हैं। वहीं, प्रदेश में करीब 8 लाख महिलाएं हमारी समूह में काम कर रही हैं। सवाल: अगर आपकी जिंदगी पर एक फिल्म बने, तो उसका पहला और आखिरी सीन क्या होगा? जवाब: कहते हैं कि जिंदगी में किताब दुनिया को पढ़ाती है। पुस्तक चुप रहता है, लेकिन दुनिया के लोग उसे पढ़कर वकील, इंजीनियर और कलेक्टर बनते हैं। पुस्तक बहुत बड़ी ताकत है। उसी तरह एक महिला है, जो घर से बाहर निकल कर घर, समाज और देश के लिए सोचती हैं तो वो भी किताब की तरह काम कर सकती हैं। मां शक्ति का रूप होती है, उसमें वो ताकत है, जो कुछ भी कर सकती है। गरीबी, अशिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए काम करने में जो सकून है वह कहीं नहीं है। सवाल: आज लोग आपको पद्मश्री के नाम से जानते हैं, लेकिन फूलबासन यादव बनने की सबसे कठिन कीमत क्या रही? जवाब: जब गरीबी में जी रही थी, तब भीख मांगने के लिए मजबूर थी। लोग गालियां देते थे। मैं कभी सोची भी नहीं थी कि मुझे पद्मश्री मिलेगा, कौन बनेगा करोड़पति में जाऊंगी, पुरस्कार मिलेगा। लेकिन, कहते हैं न कि परिस्थिति इंसान को मजबूर बनाती है तो वही परिस्थिति इंसान को ज्वाला भी बना देती है। 20 साल तक गरीबी झेलने की कीमत क्या है यह मैं करीब से जानती हूं, यह किताब में लिखी बातें नहीं है, उसे मैं झेल चुकी हूं। सवाल: गरीबी ने आपको सबसे बड़ा सबक क्या सिखाया? जवाब: गरीबी के बीच समाज में जब कुछ करने के लिए सोचा, तब लोगों से गालियां मिली। कहीं से कोई सहयोग नहीं। गरीब महिलाओं को जोड़कर समाज सेवा करने के लिए आगे बढ़ी, जिसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। समाज सेवा के उस दौर में मैंने अपने बच्चों के लिए कभी नहीं सोचा। मुझे लगा कि मेरे चार बच्चे नहीं, बल्कि प्रदेश और देश का हर जवान मेरा बच्चा है। हर महिलाओं की बहन हूं, जिनके लिए मुझे काम करना है। फूलबासन यादव बोलीं- समाज सेवा में पहले गाली, फिर ताली मिलती है फूलबासन यादव ने कहा कि कोई भी काम बिना मेहनत और लगन के सफल नहीं होता। जब आप समाज के लिए अच्छा काम करना शुरू करते हैं, तो शुरुआत में आलोचना और विरोध झेलना पड़ता है। जब आपका काम सफल होता है, तो वही लोग आपकी सराहना करते हैं। इसलिए समाज सेवा में पहले गाली मिलती है, फिर ताली। सोमवार को फूलबासन यादव बिलासा कला मंच की ओर से आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने पहुंची थीं जहां उन्होंने ये बातें कही। ………………….. यह इंटरव्यू भी पढ़िए… रायपुर की 10वीं क्लास की महिमा बनाएगी सैटेलाइट: अंतरराष्ट्रीय स्पेस-मिशन ‘ShaktiSAT’ के लिए सिलेक्ट, 108 देशों के स्टूडेंट्स शामिल होंगे, बोलीं- प्राउड मोमेंट रायपुर के तिलक नगर स्थित स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट इंग्लिश मीडियम स्कूल की 10वीं की छात्रा महिमा राजपूत का चयन अंतरराष्ट्रीय स्पेस मिशन ‘ShaktiSAT’ के लिए हुआ है। वह देश भर से आए आवेदनों के बीच कई चरणों की ऑनलाइन चयन प्रक्रिया को पार कर नेशनल फाइनलिस्ट बनी हैं। पढ़ें पूरा इंटरव्यू…
