हिड़मा के गांव पूवर्ती में बदले हालात:जहां वोट डालना गुनाह था, वहां अब वोटर कार्ड बनवाने की भीड़, 400 नाम जुड़ेंगे

जहां कभी वोट डालना गुनाह था। महिला अंगुली से वोटिंग का निशान मिटाती दिखी थी। उसे डर था कि वोट डालने के अपराध में नक्सली उसके हाथ या अंगुली काट देंगे। अब तस्वीर बदल गई है। सबसे बड़े नक्सली हिड़मा का गांव पूवर्ती। यहां वोटर कार्ड बनवाने के लिए भीड़ जुटी है। इनमें भी ज्यादातर महिलाएं। कोई भय नहीं। गांव के स्कूल के ही शिक्षक नए वोटरों के नाम लिख रहे हैं। फिर एक-एक कर तस्वीर खींची गई। करीब 400 नए वोटर पूवर्ती की वोटर लिस्ट में जुड़ जाएंगे। 31 मार्च को सशस्त्र नक्सली खत्म होने की घोषणा हुई थी। अब ग्राउंड पर क्या बदलाव हुए- ये समझने पहुंची भास्कर टीम। हमने देखा 16 जून को पूरे राज्य की तरह ही यहां स्कूल खुल गए। सड़कें बन रही हैं। आंगनबाड़ी और स्कूलों के नए भवन तैयार हो रहे हैं। सबसे बड़ी बात कि बैंक शाखा खुली मिली। यहां लोग भी बिना डर के आते-जाते दिखे। हालांकि जंगलों पर अधिकार पर लोग अब भी जागरूक हैं। वे खुलकर कहते हैं- भय का माहौल नहीं होना चाहिए लेकिन सरकार ने फिर से जंगलों को हमसे छीना तो आंदोलन का रास्ता लेना पड़ेगा। एक और खास बात कि अब भी हर पांच से छह किमी पर सीआरपीएफ या छत्तीसगढ़ रिजर्व पुलिस बल के कैंप लगे हैं। वे लगातार रोकते हैं, टोकते हैं। आपकी गाड़ी की एंट्री करते हैं। सब कुछ सुरक्षा के लिए। यानी पहरा अब भी कड़ा है। जरूरी भी है शायद। तो चलिए शुरू करते हैं यात्रा बदले हुए बस्तर की…। सबसे पहले हम दंतेवाड़ा से बैलाडीला खदान से होते हुए अरनपुर पहुंचे। यहां रोड पर ही ब्लास्ट हुआ था, जिसमें 10 जवान और एक ड्राइवर की मौत हुई थी। सड़क के जख्म को भरा नहीं गया है। वह पेड़ भी जहां बैठकर ब्लास्ट किया गया था। अगला पड़ाव पूवर्ती। सबसे बड़े नक्सली कमांडर हिड़मा का गांव।
फैसले थोपेंगे नहीं, परंपराओं के अनुसार यहां विकास होगा 40 साल यानी दो पीढ़ी का नुकसान हुआ है। सरकार का मत है कि यहां कोई फैसला थोपेंगे नहीं। स्थानीय रीति-रिवाजों, परंपराओं के तहत इन्क्लूसिव विकास का मॉडल लाना है। वे अपने फैसले खुद लेंगे। सरकार संपर्क यानी सड़क, स्कूल, अस्पताल जैसे काम करेगी।
-सुंदरराज पी, आईजी बस्तर बुर्कापाल: अब बाजार जाने में डर नहीं लगता
2017 में यहां नक्सलियों के हमले में 25 जवान शहीद हुए थे। 300 से ज्यादा हथियारबंद नक्सलियों ने हमला किया था। आज गांव में विवाह समारोह के बाद की दावत है। महिला-पुरुष सब लंदा (चावल की शराब) पी रहे हैं। गांव के बाहर सड़क पर कुछ युवा मिले। जब उनसे पूछा- तो बोले आप यहां तक आ गए हैं। घूम रहे हैं। यही सबसे बड़ा बदलाव है। ताड़मेटला: सड़क-बिजली नहीं, पर भय खत्म
सबसे बड़ा हमला 2010 में यहीं हुआ था। 76 जवान शहीद। अब भी सीआरपीएफ का कैंप है। गांव सड़क से अंदर 5 किमी है। कोई सड़क नहीं। रास्ता भी ऊबड़-खाबड़। यहां जाने के लिए बाइक ही एकमात्र सहारा है। कुछ पैदल भी चलना पड़ा। यहां सड़क-बिजली नहीं पहुंची है। गांव में कोई बात नहीं करता। एक युवा से बात हुई- बोला अब तो कुछ डर कम हुआ है। बाजार जा पाते हैं। पहले तो महिलाओं को भेजना पड़ता था। गांववाले नक्सलियों से नहीं पुलिस से डरते हैं। जगरगुंडा: 20 साल तार के घेरे में थे, नक्सली सड़क खोद देते थे, अब बसें चल रहीं, बैंक भी
फोर्स ने पहले यहां पूरे गांव को तारों से घेर रखा था। 20 साल से यह घेराबंदी थी। अब बाजार हमेशा खुला रहता है। यहां से बीजापुर, दोर्नापाल, दंतेवाड़ा के लिए बसें चल रही हैं। कब से चल रहीं हैं बसें- पूछने पर ग्रामीण बोले नक्सली पहले सड़क खोद देते थे। इसलिए बस बंद हो जाती थीं। दो माह से सबकुछ बहुत आसान हो गया है। यहां बैंक भी खुला है। सरकार ने सरेंडर करने वाले नक्सलियों को पैसे दिए हैं। दो लोग तो अभी पैसे लेकर गए हैं बैंक से। पूवर्ती: बाइक की आवाज से कभी गांव खाली हो जाता था, अब चौपाल लगती है पूवर्ती में आंगनबाड़ी के शिक्षक हिड़मा के रिश्तेदार हैं। गांव में भीतर कुछ आदिवासी बैठे मिले। किसी तरह जान पाए कि उनमें से एक हिड़मा के बड़े भाई मुइया माड़वी हैं। वे और उनके साथ के ग्रामीण बताते हैं कि उनका सरपंच कोंटा में रहता है। उसे किसने वोट दिया- उसे ही पता होगा। गांव से तो किसी ने वोट ही नहीं डाला। इस बार गांव के ही किसी पढ़े-लिखे युवा को सरपंच बनाएंगे- जो गांव में ही रहकर विकास करे। हिड़मा के भाई से पूछा कि आप सरपंच नहीं बनेंगे। वे बोले-हम तो पढ़ना नहीं जानते। गांव के ज्यादातर लोग तो कभी जगदलपुर तक नहीं गए। क्या करेंगे जाकर। वहां कोई हमारी भाषा ही नहीं समझेगा।

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