सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के सबरीमाला मंदिर की परंपराओं को कैसे चुनौती दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर 7 सवाल तय किए हैं। इनमें से एक सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति, जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, उस ‘धार्मिक संप्रदाय या समूह’ की किसी प्रथा को जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से चुनौती दे सकता है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि सबरीमाला मामले में याचिकाकर्ता कौन थे। ‘मूल याचिकाकर्ता भक्त नहीं थे। किसी भी भक्त ने इस प्रथा को चुनौती देने के लिए अदालत का रुख नहीं किया। तो फिर ये रिट याचिकाकर्ता कौन हैं जो इसे चुनौती दे रहे हैं।’ मेहता ने जवाब दिया कि मूल याचिकाकर्ता ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ नामक वकीलों का एक संगठन है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “वे भक्त नहीं हैं। लेकिन हमें यह स्पष्ट करना होगा। क्या भगवान अयप्पा का कोई भी भक्त इस परंपरा को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर कर सकता है और यदि कोई गैर-भक्त, जिसका उस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, इसे चुनौती देता है, तो क्या यह अदालत ऐसी याचिका पर सुनवाई कर सकती है। दूसरे दिन की सुनवाई के 5 पॉइंट्स सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे। धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाद मामले की लाइव अपडेट्स के लिए ब्लॉग से गुजर जाएं…
