आदिवासी-ईसाई विवाद से भड़की हिंसा की इनसाइड स्टोरी:जिस चर्च को डराकर बनाया, भीड़ ने उसे जलाया, यीशु को मानने वाले गांव छोड़कर जंगलों में छिपे

जो आदिवासी अपने पेन-पुरखा का नहीं, वे आदिवासी नहीं…कांकेर के आमाबेड़ा पहुंचने से करीब डेढ़ किलोमीटर पहले सड़क किनारे लगा यह पोस्टर सबसे पहले नजर आता है। यही इलाका है, जहां बड़े तेवड़ा गांव में सरपंच ने अपने पिता के शव को बाड़ी में दफनाया। इसके बाद विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। 3 दिनों तक चले तनाव में आदिवासी और मसीही समुदाय आमने-सामने आ गए। हालात यहां तक बिगड़े कि आमाबेड़ा और बड़े तेवड़ा इलाके में बने 3 चर्च और प्रार्थना भवनों में आगजनी, पत्थरबाजी और तोड़फोड़ हुई। हिंसा की चपेट में सिर्फ दोनों पक्षों के ग्रामीण ही नहीं आए, बल्कि हालात संभालने पहुंची पुलिस भी निशाने पर रही। इस दौरान एडिशनल एसपी, डीआईजी, एसआई, एएसआई समेत 25 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है। बवाल के बीच भास्कर डिजिटल की टीम ग्राउंड रिपोर्ट के लिए आमाबेड़ा और बड़े तेवड़ा गांव पहुंची। यहां सन्नाटा, जले हुए ढांचे और डरे हुए लोग थे। इस बात की गवाही दे रहे हैं कि एक शव दफनाने का विवाद कैसे हिंसा में बदल गया। पढ़िए, इस पूरी हिंसा की ग्राउंड रिपोर्ट और उसके पीछे की इनसाइड स्टोरी… पहले ये तस्वीरें देखिए… हर 100 मीटर में पुलिस का पहरा आमाबेड़ा से बड़े तेवड़ा जाने वाली कच्ची सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ है। हर 100 मीटर पर पुलिस का पहरा है। बड़ी संख्या में पुलिस और डीआरजी के जवान फ्लैग मार्च निकाल रहे हैं और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील कर रहे हैं। जले हुए प्रार्थना भवन की दीवारों से अब भी धुएं की गंध उठ रही है। यही वो गांव है, जहां एक शव दफनाने से शुरू हुआ विवाद अब हिंसा, पथराव और आगजनी तक पहुंच चुका है। बड़े तेवड़ा गांव पूरी तरह सूना दिखाई देता है। घरों के बाहर सिर्फ मवेशी नजर आते हैं। गलियों में सन्नाटा है और हर तरफ केवल सुरक्षाबल और पुलिस के जवान तैनात हैं। सरपंच का परिवार अंडरग्राउंड करीब 900 की आबादी वाले इस गांव में छह टोला हैं। यहां लगभग 26 परिवार ऐसे हैं, जो यीशु को मानने वाले बताए जा रहे हैं, जबकि गांव का बड़ा हिस्सा आज भी अपने पारंपरिक आदिवासी देवी-देवताओं की पूजा करता है। हिंसा के बाद गांव के सरपंच रजमन सलाम का पूरा परिवार गांव छोड़ चुका है। उनके घर में ताला लगा हुआ है। बाड़ी में जिस जगह दो दिन पहले रजमन सलाम के पिता चमरा राम सलाम का शव दफनाया गया था, वहां अब गड्ढा भर दिया गया है। लेकिन मिट्टी और मुरूम का रंग और निशान साफ बता रहे हैं कि यहीं से शव निकाला गया था। हिंसा के बीच खाना छोड़कर निकला सरपंच परिवार सरपंच के घर के भीतर हालात और भी कुछ कहते हैं। रसोई में मृत्यु भोज की तैयारी चल रही थी। हंडी में चावल पके हुए हैं। सब्जी बनाने के लिए केले की सब्जी कटी हुई पड़ी है। चूल्हे में जली हुई लकड़ियां लगी हैं। लेकिन आग बुझ चुकी है। पास ही थाली में चावल-दाल परोसा हुआ रखा है। ऐसा लगता है जैसे हिंसा की खबर मिलते ही परिवार का कोई सदस्य खाना तक छोड़कर घर से निकल गया हो। गांववाले बोले – मूल धर्म में लौटना होगा सरपंच के घर से थोड़ी दूरी पर ही एक बाड़ी में काम करते शिवलाल सलाम मिलते हैं। वे बताते हैं कि वे भी इसी परिवार से हैं, लेकिन अब अलग रहते हैं। शिवलाल कहते हैं कि उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया है, लेकिन इस विवाद में वे गांव के उस पक्ष में खड़े थे, जो शव दफनाने का विरोध कर रहा था। शिवलाल बताते हैं कि चमरा राम की मौत के बाद गांव में सामाजिक बैठक हुई थी। इसमें रजमन सलाम से साफ कहा गया था कि जब तक वे अपने मूल धर्म में वापस नहीं लौटते, तब तक गांव में शव दफनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।उनका आरोप है कि इसके बावजूद रजमन और उसके भाइयों ने बाड़ी में शव दफना दिया। इसके बाद गांव और आसपास के लोग विरोध के लिए पहुंचे। शिवलाल के मुताबिक, इसी दौरान रजमन ने बाहर से मसीही समाज के लोगों को बुला लिया, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच मारपीट शुरू हो गई। विवाद बढ़ने पर कांकेर जिला मुख्यालय के अलावा अंतागढ़, भानुप्रतापपुर, कोंडागांव और चारामा के आगे के इलाकों से भी गोंड समाज के लोग यहां पहुंच गए। हालात बेकाबू हो गए और आक्रोशित भीड़ ने चर्च और प्रार्थना भवनों में तोड़फोड़ कर आग लगा दी। सरपंच के ससुर बोले – दामाद को मूल धर्म में लौटने कहूंगा ये कहना है बड़े तेवड़ा गांव में बने चर्च के पास रहने वाले लक्ष्मण दुग्गा का। लक्ष्मण, गांव के सरपंच रजमन सलाम के ससुर हैं। लक्ष्मण बताते हैं कि रजमन का परिवार पिछले 2-3 सालों से ही यीशु मसीह को मानने लगा था। रजमन चार भाइयों में सबसे छोटा है। उसके दो बड़े भाई रामसाय और रामलाल ईसाई धर्म को मानते हैं, जबकि एक भाई रामसिंह ने धर्म परिवर्तन नहीं किया है। बीमारी ठीक होने के बाद रजमन ने यीशु पर भरोसा करना शुरू किया। हमने उसे समझाया भी था कि अपने मूल देवी-देवताओं को मत छोड़ो, लेकिन उसने हमारी बात नहीं मानी। अगर तब मान लेता, तो शायद आज ये हालात नहीं बनते। जब उनके समधी चमरा राम की मौत हुई, तब गांव वालों ने शव को दफनाने की अनुमति नहीं दी। रजमन ने गांव के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि चर्च जाने वाले भाइयों की बजाय रामसिंह से आदिवासी रीति-रिवाज के मुताबिक अंतिम संस्कार करा दिया जाए। गांव दफनाने की इजाजत मांगी, नहीं मिलने पर दफनाया रजमन ने केवल इतना कहा था कि पिता होने के नाते उसे मिट्टी देने की इजाजत दी जाए, लेकिन गांव वालों ने इसकी भी इजाजत नहीं दी। इसी के बाद रजमन और उसके परिवार ने अपने घर की बाड़ी में ही शव को दफना दिया। लक्ष्मण का कहना है कि यहीं से विवाद और बढ़ता चला गया। दो दिन बाद प्रशासन ने कब्र खोदकर शव को बाहर निकाला और पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया। फिर हिंसा और चर्च में तोड़फोड़ हुई। मैं तो आदिवासी देव को मानने वाला हूं लेकिन रजमन का ससुर होने की वजह से परिवार की सुरक्षा को लेकर डर है। गायता बोले – हमें डराकर चर्च बनाया गया गांव में सामाजिक और धार्मिक कार्यों का नेतृत्व करने वाले गायता (पुजारी) अंकालू राम सलाम का कहना है कि जब गांव में चर्च का निर्माण हो रहा था, तब भी उन्होंने और गांव के लोगों ने इसका विरोध किया था। अंकालू राम के मुताबिक उस वक्त रजमन सलाम सरपंच था और इसी वजह से गांव के लोग खुलकर विरोध नहीं कर पाए। अंकालू राम सलाम का कहना है कि चर्च के आसपास सरपंच समर्थकों की ही बस्ती है। गांव के लोगों को डराया-धमकाया गया, इसलिए सभी चुप रहे। उनका कहना है कि ईसाई धर्म मानने वाले लोग गांव के देवी-देवताओं की पूजा नहीं करते और न ही प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसी वजह से गांव की सामाजिक बैठक में यह कहा गया था कि जो लोग गांव के देवी-देवताओं और रीति-रिवाजों को नहीं मानते, वे गांव में शव दफन न करें। अंकालू राम का कहना है कि इस बात को मानने से इनकार किया गया, जिसके बाद विवाद बढ़ता चला गया और बाद में हिंसा की स्थिति बन गई। यीशु को मानने वालों ने गांव छोड़ दिया बड़े तेवड़ा गांव में यीशु को मानने वाले परिवारों ने फिलहाल गांव छोड़ दिया है। उनके घरों में ताले लगे हुए हैं। गलियों में सन्नाटा है। ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान हमें गांव में केवल एक ही परिवार मिला, जो ईसाई धर्म को मानने वाला है। यह परिवार महेंद्र बघेल का है। महेंद्र बघेल का कहना है कि घटना के वक्त वे घर पर ही थे। हिंसा और शोर सुनकर मैं घर से बाहर नहीं निकला। महेंद्र के मुताबिक, बाकी मसीही समाज के लोग फिलहाल गांव छोड़ चुके हैं। गांव छोड़ने के सवाल पर वे कहते हैं कि आगे क्या होगा, यह साफ नहीं है। आसपास के गांवों के लोग जंगल में छिपे रहे बड़े तेवड़ा और आमाबेड़ा में हुई हिंसा से डरकर आसपास के गांवों में रहने वाले मसीही समाज के कई लोग जंगल में छिप गए थे। भर्री टोला में रहने वाली रजाय वट्टी अपना घर छोड़कर फिलहाल कुरुटोला में रह रही है। रजाय वट्टी ने बताया कि हिंसा वाले दिन जब तेज आवाजें आने लगीं, तब वह अपने बच्चे को लेकर घर से बाहर निकल गई। आसपास कोई सुरक्षित जगह नहीं थी, इसलिए जंगल में ही छिप गई। रात करीब आठ बजे तक वहीं रही, फिर कुरुटोला आकर शरण ली। हमेशा डर बना रहता है कब क्या हो जाए- श्यामा दुग्गा इसी इलाके की श्यामा दुग्गा ने बताया कि हिंसा के दौरान वह एक घर से दूसरे घर भटकती रहीं, ताकि कहीं छिपने की जगह मिल सके। उनका कहना है कि उन्हें डर था कि चर्च में तोड़फोड़ के बाद आक्रोशित भीड़ उनके घरों को भी निशाना बना सकती है। माहौल बहुत खराब था। भर्री टोला छोड़कर मैं कुरुटोला आ गई हूं, क्योंकि यहां पुलिस की ड्यूटी लगी है। हालांकि, श्यामा का कहना है कि डर अब भी बना हुआ है। सवाल ये है कि पुलिस कितने दिनों तक हमारी सुरक्षा कर पाएगी। गांव की अनुमति के बिना शव दफनाने का अधिकार नहीं- जनजातीय सुरक्षा मंच जनजातीय सुरक्षा मंच के जिला संयोजक ईश्वर कावड़े का कहना है कि उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जिला प्रशासन से जानकारी मांगी थी कि इलाके में कितने लोग ईसाई धर्म को मानते हैं। उनके मुताबिक, जिला प्रशासन की ओर से जो जवाब मिला, उसमें ईसाई धर्म मानने वालों की संख्या शून्य बताई गई है। अब शव थाने में छोड़ेंगे-मसीह समाज कांकेर मसीह समाज कांकेर के संरक्षक डॉ. प्रदीप क्लॉडियस का कहना है कि हालात को देखते हुए समाज ने अब एक फैसला लिया है। डॉ. क्लॉडियस के मुताबिक,अगर मसीह समाज से जुड़े किसी व्यक्ति की मौत होती है, तो उसकी लाश सीधे थाने ले जाकर छोड़ी जाएगी। इससे जुड़े और भी तस्वीरें देखिए…

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