11 साल के मासूम को इनवेसिव थायमिक कैंसर:8 महीने में हो जाती मौत, मेकाहारा में सक्सेफुल सर्जरी; 10 करोड़ में एक को होता है

रायपुर के डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल (मेकाहारा) में डॉक्टरों ने 11 साल के एक बच्चे के दिल से चिपके हुए कैंसर का सफल इलाज किया है। डॉक्टर्स के मुताबिक बच्चे की 8 महीने में मौत हो सकती थी। लेकिन सर्जरी और 25 साइकिल रेडिएशन थेरेपी के बाद अब मासूम पूरी तरह स्वस्थ है। दोबारा स्कूल जाने लगा है। बच्चे को स्टेज-3 का इनवेसिव थायमिक कैंसर था। अलग-अलग मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक स्टेज-3 का थायमिक कैंसर बच्चों में मिलना रेयरेस्ट ऑफ रेयर है। मेडिकल लिटरेचर और यूरोपीय कैंसर रजिस्ट्री के मुताबिक पूरी दुनिया में अब तक ऐसे सिर्फ 5 से 15 केस ही रिपोर्ट हुए हैं। इस कैंसर का स्पष्ट कारण मेडिकल साइंस अब तक खोज नहीं पाया है। 10 लाख बच्चों में सालाना 0.01 से 0.05 केस यानी 10 करोड़ बच्चों में 1 से 5 केस मिलते हैं। मेकाहारा एडमिनिस्ट्रेशन का दावा है कि इससे पहले थायमिक कैंसर के सफल इलाज की सबसे कम उम्र 12 साल रिपोर्ट की गई है। बाकी दूसरे केस, जो अब तक अलग-अलग मेडिकल जर्नल में पब्लिश हुए हैं, इनमें भी थर्ड स्टेज में थायमिक कैंसर के इलाज का जिक्र नहीं मिला। ऐसे में संभवत: 2 वर्ल्ड रिकॉर्ड मेकाहारा के डॉक्टरों ने बनाए हैं। पहला- थर्ड स्टेज में थायमिक कैंसर (बच्चों में) का सफल इलाज। दूसरा- सबसे कम उम्र के बच्चे के थायमिक कैंसर का इलाज। भास्कर एक्सप्लेर में जानिए इनवेसिव थायमिक कैंसर क्या होता है, बच्चों में ये इतना रेयर क्यों है, इसकी हिस्ट्री क्या है और ये पूरी सर्जरी कैसे की गई… सबसे पहले इनवेसिव थायमिक कैंसर को समझिए थाइमिक कार्सिनोमा थाइमस ग्लैंड में होता है। ये ग्लैंड हमारे सीने के बीच में, दिल (हार्ट) और छाती की हड्डी (स्टर्नम/ब्रेस्टबोन) के पीछे होती है। इसका काम बॉडी में T-सेल्स बनाना और उन्हें ट्रेन करना है। ये T-सेल्स ही किसी सैनिक की तरह इन्फेक्शन, वायरस, या कैंसर सेल्स से बॉडी को प्रोटेक्ट करते हैं। 1961 में वैज्ञानिक जैक्स मिलर ने दुनिया को बताया कि थाइमस कितना जरूरी है। प्राचीन समय में लोग इसे ‘आत्मा का घर’ समझते थे क्योंकि यह दिल के पास है। थाइमस ग्लैंड बचपन और टीनएज में सबसे ज्यादा एक्टिव रहती है, क्योंकि उसी समय हमारा इम्यून सिस्टम बनता और मजबूत होता है। एडल्ट और ओल्ड एज के होने के बीच से ग्लैंड धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती है। और उसकी जगह फैट भर जाता है। यही कारण है कि बड़ों में यह ग्रंथि बहुत छोटी और कम सक्रिय रहती है। थाइमस जिस सेल्स से ये बना है उसका नाम एपिथीलियल है। जब ये एपिथीलियल सेल्स अनियंत्रित हो जाते हैं और अनियंत्रित होकर बढ़ने लगते हैं, तब ये एक बड़ा ‘गांठ’ यानी कैंसर बन जाता है। डॉक्टरों को इन सेल्स के अनियंत्रित होने का अभी तक ठीक कारण पता नहीं । न कोई वायरस, न धूम्रपान, न प्रदूषण का सीधा लिंक। बस अंदरूनी गड़बड़। ज्यादातर 40-60 साल के लोगों में होता है। बच्चों में बहुत-बहुत दुर्लभ। हिस्ट्री से समझिए बच्चों में ये कितना रेयर साल 1832 में लंदन के डॉक्टर सर एस्टली कूपर ने पहली बार थाइमस का ट्यूमर बताया (बड़ों में)। बच्चों में 1900 के बाद से ही कुछ केस मिलने शुरू हुए, लेकिन बहुत कम। किसी मेडिकल जर्नल में कोई क्लियर रिकॉर्ड नहीं मिलता। 1976 में अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की ओर से प्रकाशित एक मेडिकल जर्नल में 12 साल के अमेरिकन लड़के चैटन के केस का जिक्र है। इस जर्नल का टाइटल है ‘थाइमोमा इन ए 12 ईयर ओल्ड बॉय’। चैटन को बचपन में थाइमस पर रेडिएशन दिया गया था। परिवार में ब्लड कैंसर की हिस्ट्री रिपोर्ट की गई थी। डॉक्टरों ने ऑपरेशन किया और रिपोर्ट पब्लिश की। यह थायमोमा था, लेकिन स्टेज-3 इनवेसिव टाइप-बी जितना खतरनाक नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक ये कैंसर स्टेज 1 पर था। साल 2000 से 2012 के बीच पूर यूरोप में सिर्फ 36 बच्चे ही मिले यूरोप के 5 देशों (फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, UK) ने मिलकर एक रजिस्ट्री बनाई। एक्सपर्ट स्टडी की गई, 2000 से 2012 के बीच के सारे रिकॉर्ड खंगाले गए। इनमें सिर्फ 36 बच्चे मिले, जिनमें 16 थायमोमा और 20 थाइमिक कार्सिनोमा के पेशेंट मिले। औसत उम्र 11-14 साल के बीच रिकॉर्ड की गई। पूरी दुनिया में 2022 तक सिर्फ 82 बच्चों के थायमोमा केस दर्ज हैं। यूरोप में 10 लाख बच्चों में सिर्फ 0.1 केस ही मिले यानी लगभग ना के बराबर। पूरी दुनिया में 18 साल से कम उम्र के 100-200 केस ही किताबों में लिखे गए हैं। लेकिन इनमें भी स्टेज-3 इनवेसिव टाइप-बी थायमिक कार्सिनोमा बच्चों में सबसे दुर्लभ है। इसके स्टेज का कोई स्पेसिफिक रिकॉर्ड नहीं मिलता। भारत में अब तक 2 से 3 केस ही रिपोर्ट हुए भारत में भी थाइमस कैंसर के कुछ केस रिपोर्ट किए गए हैं। साल 2014 में जर्नल ऑफ सर्जिकल टेक्निक एंड केस रिपोर्ट में 8 साल के लड़के के बारे में बताया गया है। जिसके थाइमस ग्लैंड में स्टेज 1 का कैंसर मिला था। बच्चे को खांसी और छाती में दर्द था। थाइमस से 7.2 से.मी. ट्यूमर निकला था। इंडियन जर्नल ऑफ बेसिक एंड एप्लाइड मेडिकल रिसर्च में भी 3 साल की एक बच्ची के बारे में बताया गया है। बच्ची को सांस लेने में तकलीफ और ऊपरी सांस की नली में संक्रमण था। थायमोमा पाया गया, लेकिन डिटेल्स कम हैं। यह बहुत छोटी उम्र का केस था, लेकिन स्टेज या इलाज की पूरी जानकारी नहीं मिली। इसके अलावा दूसरे केस पुणे, महाराष्ट्र या अन्य जगहों से मिले हैं। मेकाहारा के केस से तुलना करें तो दूसरे कैंसर थाइमिक कार्सिनोमा नहीं बल्कि थायमोमा थे। जो थाइमिक कार्सिनोमा से अलग और इसके मुकाबले बहुत धीमा होता है। अब बात 11 साल के बच्चे और उसके ट्रीटमेंट की… दिल, फेफड़े, महाधमनी सहित 5 बड़े ऑर्गन को चपेट में ले चुका था कैंसर 11 साल के बच्चे के केस में इनवेसिव थाइमिक कैंसर स्टेज-3 पर था। इसने कई महत्वपूर्ण अंगों को चपेट में ले लिया था। यह ट्यूमर बहुत बड़ा था (लगभग 12 × 8 सेमी, वजन 400 ग्राम) और दिल के ठीक ऊपर/सामने वाली जगह में था। ट्यूमर दिल से चिपका हुआ था। पेरिकार्डियम यानी दिल की बाहरी झिल्ली, फ्रेनिक यानी सांस लेने में मदद करने वाली नर्व को प्रभावित कर चुका था। इन दोनों का कुछ हिस्सा ट्यूमर से प्रभावित होने के कारण निकाला गया। शरीर की सबसे बड़ी धमनी, महाधमनी से ट्यूमर भी चिपका हुआ था। यानी मुख्य पल्मोनरी आर्टरी फेफड़ों में खून ले जाने वाली बड़ी धमनी को भी ट्यूमर ने प्रभावित किया। फेफड़े का कुछ हिस्सा भी ट्यूमर से प्रभावित था। फेफड़ों की झिल्ली में 3 अतिरिक्त सैटेलाइट ट्यूमर (छोटे-छोटे अलग गांठें) भी थे, जिन्हें सावधानी से निकाला गया। लेफ्ट एट्रियम यानी दिल के बाई ओर के अपर चैंबर से ट्यूमर इससे चिपका था, सर्जरी के जरिए इसकी मरम्मत की गई।
सर्जरी के लिए ड्यूल एप्रोच तकनीक का किया इस्तेमाल बच्चे की सर्जरी करने के लिए डॉक्टरों ने ड्यूल या टू-स्टेप एप्रोच- स्टर्नोटॉमी और थोरेक्टोमी का सहारा लिया। दरअसल, जब डॉक्टर सीने के अंदर गहराई में मौजूद ट्यूमर या बीमारी तक पहुंचना चाहते हैं, तो कभी-कभी एक ही रास्ता पर्याप्त नहीं होता। ऐसे में वे 2 अलग-अलग सर्जिकल रास्तों का इस्तेमाल करते हैं, जिसे ड्यूल या टू-स्टेप एप्रोच कहा जाता है। आसन भाषा में समझिए, स्टर्नोटॉमी में डॉक्टर छाती के बीच, सीने की हड्डी (स्टर्नम) को खोलते हैं। इससे सीधे दिल और सामने वाले हिस्से तक पहुंच मिलती है। जैसे किसी अलमारी का सामने वाला दरवाजा खोलकर अंदर देखना। वहीं थोरेक्टोमी में डॉक्टर सीने के बगल की तरफ से चीरा लगाते हैं। इससे फेफड़े और साइड में छिपे हिस्सों तक पहुंच मिलती है, जैसे उसी अलमारी का साइड वाला पैनल खोलकर अंदर के कोनों तक पहुंचना। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि दोनों तरफ से 360° व्यू देखकर डॉक्टर ट्यूमर को पूरा निकाल सके। 4 तस्वीरों में इस पूरी प्रक्रिया को समझिए… पहले कई अस्पतालों ने कर दिया था मना मेकाहारा में हार्ट सर्जन डॉ कृष्णकांत साहू ने बताया कि चांपा निवासी इस बच्चे को 6 महीने से छाती में दर्द, भारीपन, सांस फूलना जैसी शिकायत थी। जांच में बड़ा ट्यूमर मिलने के बाद कई अस्पतालों ने ऑपरेशन से मना कर दिया था, जिसके बाद उसे रायपुर रेफर किया गया। डॉ साहू ने बताया कि सर्जरी के दौरान एक समय ख्याल आया कि ये बहुत मुश्किल है। लेकिन फिर सोचा कि ये काम हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। कोशिश की गई। हमने ट्यूमर का एक अंश भी नहीं छोड़ा और ये सर्जरी पूरी कर दिखाई। 3 सैटेलाइट ट्यूमर भी निकाले गए, पूरी सर्जरी करीब 4 घंटे चली और इस दौरान हार्ट-लंग मशीन का बैकअप रखा गया था। 5 से 7 दिन बाद बच्चा चलने लायक हो गया था। 10 से 12 दिन बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। 6 महीने बाद बच्चा पूरी तरह स्वस्थ सर्जरी और 25 साइकिल रेडिएशन थेरेपी के बाद अब बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है, दोबारा स्कूल जाना शुरू कर चुका है। इस साल कक्षा 6वीं की परीक्षा भी दे चुका है। इस दुर्लभ केस को राष्ट्रीय कैंसर सर्जरी सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया, जहां इसे बेस्ट पेपर अवॉर्ड मिला। अब इसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित करने की तैयारी है। प्रदेश का प्रमुख सर्जरी सेंटर बता दें कि, पं. नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध यह अस्पताल छत्तीसगढ़ और आसपास के राज्यों में छाती, फेफड़े और मीडियास्टाइनल कैंसर सर्जरी का प्रमुख केंद्र है। प्रदेश की 95% से ज्यादा सर्जरी यहीं होती हैं। इस जटिल ऑपरेशन में सर्जन, एनेस्थेटिस्ट, जूनियर डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और टेक्नीशियनों की बड़ी टीम शामिल रही। ………………………. मेकाहारा की सर्जरी से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ब्रश करते समय फटी गले की धमनी: गाय के दिल की झिल्ली से किया रिपेयर,मेकाहारा के डॉक्टरों ने बचाई जान, दुनिया में सिर्फ 10 केस सुबह के 8-9 बजे थे। रायपुर के भनपुरी में रहने वाले राहुल जांगड़े (40) सुबह की डेली रूटीन फॉलो कर रहे थे। पत्नी ने चाय-नाश्ते के लिए पूछा, तो जवाब दिया कि ब्रश करके आता हूं। इसके बाद पल-पल दिल के पास…गाना गुनगुनाते हुए वॉशरूम के अंदर गए। पढ़ें पूरी खबर

More From Author

देशभर में ईद-उल-फित्र आज:राष्ट्रपति मुर्मू और पीएम मोदी ने बधाई दी; अजमेर शरीफ दरगाह में जन्नती दरवाजा खोला गया

वर्ल्‍ड हैप्‍पीनेस इंडेक्‍स रैंकिंग में पाकिस्‍तान से भी पीछे भारत:सरकार ने 300 बेटिंग वेबसाइट्स, एप ब्‍लॉक किए; 21 मार्च के करेंट अफेयर्स

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *