शायर अजहर बोले- नई पीढ़ी ने भाषा का बंधन तोड़ा:रायपुर में कहा- कविताएं इंसानी वजूद का एहसास कराती है, परिस्थितियां अच्छा लेखक बनाती हैं

खुद में बात करने का नाम शायरी है। शायरी और कविताएं न होती तो शायद इंसान को उसके इंसान होने का एहसास नहीं होता। ये कहना है देश के मशहूर शायर अजहर इकबाल का। दरअसल, रविवार को एक साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने वो राजधानी रायपुर पहुंचे। इस दौरान दैनिक भास्कर से उन्होंने शायर, शायरी और इश्क पर बात की। उन्होंने बताया- 16 साल की उम्र में उन्होंने पहली शायरी लिखी थी। वहीं नई पीढ़ी को लेकर उन्होंने कहा कि इस पीढ़ी ने जुबां की बंधी हुई धारणा को तोड़ा है।पढ़िए पूरा इंटरव्यू… सवाल: शायरी की दुनिया में कैसे आपका आना हुआ?
जवाब- वेस्टर्न यूपी के मुजफ्फरनगर जिले में एक छोटा सा कस्बा है बुढ़ाना। मैं इसी कस्बे से संबंध रखता हूं। साहित्य दृष्टि ये क्षेत्र उपजाऊ है। घर में सब लोग शायरियां पढ़ते थे। अफसाने सुनते थे। इर्द–गिर्द यही चलता था। सोशल मीडिया तब तक जीवन में शामिल नहीं हुआ था। मनोरंजन के कुछ चुनिंदा साधन ही थे। मैग्जीन में छपी कहानियां, अम्मा–दादी की किस्सागोई और वीकेंड पर बाहर गोष्ठियां होती थीं। सवाल: आपको अपनी पहली शायरी याद है?
जवाब: हमारे यहां गोष्ठियों में एक ट्रेंड चलन में था। हमें किसी कवि या शायर की कोई पंक्ति दी जाती थी। और इन पंक्तियों से हमें कुछ नया क्रिएट करना होता था। ऐसी ही एक गोष्ठी में मुझे दुष्यंत कुमार की लिखी लाइन दी गई ‘मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए…इस पर मुझे शेर लिखना था। तब मेरी उम्र 16 साल थी। इस गजल को तोड़–मरोड़ कर मैंने एक शायरी लिखी “वो फूल बनकर मेरी पास ही महकता रहा, मैं सोचता ही रहा अपने हमसफर के लिए” ये पहली दफा था जब मैंने कुछ लिखा जिसे शायरी कहा जा सके। सवाल: लोगों का मानना है कि स्थिति आदमी को शायर बना देती है, क्या ऐसा कुछ होता है?
जवाब: जब आदमी मोहब्बत में टूटता है या उसे अपने जीवन में विरह का सामना करना पड़ता है। तो जाहिर है इससे वो दुखी होता है। ऐसे में वो कुछ न कुछ लिखता जरूर है। कहने का मतलब ये है कि दुख में, उदासी में आदमी खुद से गुफ्तगू कर रहा होता है। और शायरी जो है, वो खुद से बात करने का नाम है। सवाल: आपके लिए इश्क क्या है?
जवाब: आप गौर करेंगे कि जब हम मोहब्बत की मिसाल देते हैं, एक्सट्रीम लेवल पर जाकर। हमें कुछ नाम याद आएंगे लैला–मजनू, सस्सी–पुन्नू, सोहनी–महिवाल। इन सब के बीच एक बात कॉमन है, वो ये कि इनका मिलन नहीं हो पाया। सवाल: इस दुनिया से शायरी रुख्सत होती तो क्या होता?
जवाब: मेरा मानना कि इस दुनिया में कविताएं नहीं होती, शायरी नहीं होती तो इंसान को इंसान होने का एहसास कभी नहीं हो पाता। शक पैदा हो जाता है कि आप इंसान हो भी पाते या नहीं। सवाल: शायरों का एक खास लुक होता है। क्या ये क्रिएट किया जाता है?
जवाब: मुझे लुक क्रिएट करने की जरूरत नहीं है। अगर कोई शायर है तो वो नेचुरल होगा। उसके अंदर आपको बनावट नजर नहीं आएगी। मेरी ही बालों को देखिए उलझे हुए हैं। लोगों को शायद लगे कि मैंने ये सेट कराया है। पर ऐसा है नहीं, शायर अपने लुक, पहनावे को लेकर बहुत ज्यादा कॉन्शियस नहीं रहता। बस वो वैसा रहता है, दिखता है। जैसा वो है। सवाल: नए शायर जो आ रहें, उनके लिए कोई मैसेज?
जवाब: साल 2000 के पहले ऐसा लगता था कि हमारी जो नई जेनरेशन है वो शायरी और साहित्य की तरफ नहीं आ रही है। लेकिन इसके बाद जब सोशल मीडिया में लोग एक्टिव हुए तो मालूम हुआ कि हमारी नई पीढ़ी भी बहुत अच्छा लिख रही है। सबसे अच्छी बात ये है कि जुबां को लेकर जो खास धारणा होती है, वो टूट रही है। यही कहूंगा कि भावनाओं को एक्सप्रेस करना का सबसे अच्छा तरीका लेखनी है। तो अच्छा पढ़ते रहिए और अच्छा लिखते रहिए। कोशिश करते रहिए।

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