केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार (31 दिसंबर) को कर्ज में डूबी टेलीकॉम कंपनी वोडाफोन-आइडिया (Vi) के लिए एक बड़े राहत पैकेज को मंजूरी दे दी है। कैबिनेट के इस फैसले के तहत कंपनी के ₹87,695 करोड़ के एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) बकाए को फिलहाल ‘फ्रीज’ कर दिया गया है। इसका मतलब है कि कंपनी को अब यह भारी-भरकम राशि तुरंत नहीं चुकानी होगी। सूत्रों के मुताबिक, यह भुगतान अब वित्त वर्ष 2032 से 2041 के बीच 10 साल की विंडो में करना होगा। 5 साल का मोरेटोरियम मिला, तुरंत नहीं देना होगा पैसा कैबिनेट ने वोडाफोन-आइडिया को पांच साल का मोरेटोरियम (भुगतान में छूट) भी दिया है। इस फैसले से नकदी संकट से जूझ रही कंपनी को बड़ी राहत मिली है। कंपनी लंबे समय से सरकार से गुहार लगा रही थी कि उसे बकाया चुकाने के लिए और समय दिया जाए। अगर यह राहत नहीं मिलती, तो कंपनी के लिए अपना ऑपरेशन्स जारी रखना मुश्किल हो जाता। अब अगले कुछ सालों तक कंपनी को AGR बकाए से जुड़ी बड़ी किस्तों का भुगतान नहीं करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने फैसला लिया यह राहत सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया रुख के बाद आई है जिसमें सरकार को AGR बकाए का कैलकुलेशन पर दोबारा विचार करने की अनुमति दी गई थी। इससे पहले कोर्ट ने कड़ी सख्ती दिखाई थी, लेकिन बाद में सरकार (जो खुद Vi में सबसे बड़ी शेयरहोल्डर है) ने कंपनी के अस्तित्व को बचाने के लिए हस्तक्षेप किया। सरकार ने कोर्ट को बताया था कि टेलीकॉम सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने और करोड़ों ग्राहकों के हितों के लिए वोडाफोन-आइडिया का टिके रहना जरूरी है। सरकार की कंपनी में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी केंद्र सरकार फिलहाल वोडाफोन-आइडिया में करीब 49% हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ी शेयरहोल्डर है। पिछले कुछ सालों में कंपनी ने अपने स्पेक्ट्रम और ब्याज बकाए को इक्विटी (शेयर) में बदल दिया था, जिससे सरकार की हिस्सेदारी बढ़ गई। कंपनी पर कुल कर्ज ₹2 लाख करोड़ से ज्यादा है, जिसमें AGR बकाया और स्पेक्ट्रम की बकाया राशि सबसे बड़ा हिस्सा है। कंपनी का नेटवर्क सुधारने और निवेश पर रहेगा फोकस इस राहत के बाद वोडाफोन-आइडिया अब नए निवेश और बैंक लोन जुटाने पर ध्यान दे सकेगी। कंपनी के CEO ने हाल ही में कहा था कि बकाया राशि पर स्पष्टता मिलने के बाद वे बैंकों से फंड जुटाने की प्रक्रिया शुरू करेंगे। इस पैसे का इस्तेमाल मुख्य रूप से 5G नेटवर्क लॉन्च करने और मौजूदा 4G इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के लिए किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से टेलीकॉम मार्केट में ‘डूओपोली’ (सिर्फ जियो और एयरटेल का दबदबा) बनने का खतरा फिलहाल टल गया है।
