उत्तर कांड; लव-कुश कहते हैं- जो रामायण का प्रतिदिन पाठ करता है, वह धन और दीर्घायु तो प्राप्त करता ही है, उसे सभी तीर्थों की यात्रा के बराबर पुण्य भी मिलता है संवाद-1 } सीता-धरती-श्रीराम
{प्रभु राम के दरबार में उपस्थित हुई सीता कहती हैं- मैं श्रीराम के सिवा किसी पुरुष का स्पर्श तो दूर, मन से भी चिंतन नहीं करती, यदि यह सत्य है, तो पृथ्वी देवी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। {तभी पृथ्वी देवी प्रकट होती हैं और सीताजी को गोद में बिठाकर रसातल में समा जाती हैं। {यह देख श्रीराम दुख में डूब जाते हैं और कहते हैं- ‘पूजनीये भगवती वसुंधरे, सीता को लौटा दो या मेरे लिए भी अपनी गोद में जगह दो। {ब्रह्माजी के बहुत समझाने के बाद श्रीराम शांत होते हैं। चुनौती : आज के समाज में स्त्री के आत्मसम्मान, भरोसे और सामाजिक निर्णयों पर बार-बार सवाल उठते हैं। सीख: क्रोध या प्रतिशोध न चुनें। शांति, धैर्य और आत्मविश्वास से उत्तर दें। अपमान या अविश्वास झेलना पड़े, तो संयम ही सबसे अच्छा उत्तर होता है। संवाद-2 } श्रीराम-काल-लक्ष्मण
{11 हजार वर्ष जीने के बाद श्रीराम को लेने काल आए। उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि यदि किसी ने उन्हें देखा, तो उसे मृत्युदंड देना होगा। {श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा- किसी को अंदर न आने दें। {तभी दुर्वासा ऋषि आए और कहा- श्रीराम से मिलना है, अन्यथा सब नष्ट कर दूंगा। {विवश लक्ष्मण अंदर चले गए। {श्रीराम सोचने लगे कि लक्ष्मण को मृत्युदंड कैसे दूं? {तब महर्षि वशिष्ठ ने सलाह दी कि आप प्रतिज्ञा नष्ट न करें। उससे धर्म का लोप हो जाएगा। लक्ष्मण का परित्याग करें। चुनौती : कभी-कभी नियम-कायदे तोड़ने वाले अपने चहेतों को भी सजा देने का धर्मसंकट पैदा हो जाता है। सीख: सही निर्णय लेने का मूल्य त्याग से चुकाना पड़ता है, वही सच्चा नेतृत्व है। कर्तव्य का पालन कठिन हो सकता है, पर उसी में स्थायी सम्मान है। संवाद-3 } श्रीराम-भरत-शत्रुघ्न {लक्ष्मण के सरयू में देह त्याग के बाद श्रीराम ने कहा- मैं अयोध्या के राज पर भरत का राज्याभिषेक करूंगा और लक्ष्मण के पथ का अनुसरण करूंगा। {भरत ने कहा- आपके बिना मुझे राज्य नहीं चाहिए। आप कुश और लव का राज्याभिषेक कीजिए। देह त्याग के लिए मैं भी आपके साथ चलूंगा। {अयोध्या की संपूर्ण प्रजा श्रीराम के पीछे-पीछे सरयू की ओर चलने लगी। जिस-जिस ने सरयू में गोता लगाया वो दिव्य शरीर धारण कर देवताओं के समान दीप्तिमान हो गया। चुनौती: नेतृत्व और संबंधों’ में नियंत्रण अपने हाथ में ही रखने का मोह आम है। सीख: यह संवाद सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व छोड़ने में है, बांधने में नहीं। जब नेतृत्व और समाज दोनों में सत्य और समर्पण हो, तो हर अंत दिव्यता में बदल जाता है। जो मनुष्य प्रतिदिन पाप करता है, वह भी यदि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित इस रामायण के एक श्लोक का भी नित्य पाठ करता है तो पापराशि से मुक्त हो जाता है। पुत्रहीन को पुत्र और धनहीन को धन मिलता है। इस लोक में जिसने रामायण की कथा सुन ली, उसने मानो प्रयाग आदि तीर्थों, गंगा आदि पवित्र नदियों, नैमिषारण्य आदि वनों और कुरुक्षेत्र आदि पुण्यक्षेत्रों की यात्रा पूरी कर ली। जो व्यक्ति इसे प्रतिदिन सुनता है, वह निष्पाप होकर दीर्घ आयु प्राप्त कर लेता है। इसे सुनने वाले मनुष्य के पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध प्रपितामह और उनके भी पिता भगवान विष्णु को प्राप्त कर लेते हैं, इसमें संशय नहीं है। जो रामायणकाव्य के एक श्लोक या चरण का भक्तिभाव से श्रवण करता है, वह ब्रह्माजी के धाम में जाता है।’
