भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) के तहत गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) की कार्यवाही को खारिज कर दिया है। भारत ने कहा है कि वह इस अदालत की वैधता को नहीं मानता और इसकी किसी भी प्रक्रिया में शामिल नहीं होगा। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने कहा है कि जब सिंधु जल संधि को ही भारत ने स्थगित कर रखा है, तो उस संधि के तहत बनी किसी संस्था को जवाब देने की बाध्यता नहीं है। कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने फरवरी 2-3 को नीदरलैंड्स के पीस पैलेस में सुनवाई तय की है। साथ ही भारत के बगलिहार और किशनगंगा हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स से जुड़े ‘पोंडेज लॉगबुक’ दस्तावेज पेश करने का आदेश दिया है। भारत ने इन आदेशों का जवाब देने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान अकेले ही दलीलें देगा कोर्ट ने 24 जनवरी 2026 के आदेश में कहा कि अगर भारत मौजूद नहीं रहता, तो पाकिस्तान अकेले ही सुनवाई में दलीलें देगा। इसके बाद 29 जनवरी को कोर्ट ने भारत से बगलिहार और किशनगंगा प्रोजेक्ट्स के ऑपरेशनल रिकॉर्ड मांगे। कोर्ट ने कहा है कि अगर जरूरी दस्तावेज पेश नहीं किए गए, तो वह मान सकता है कि ये कागजात जानबूझकर छिपाए जा रहे हैं और इससे उनके खिलाफ फैसला जा सकता है। साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि भारत ने संधि को रोकने का जो फैसला लिया है, उससे कोर्ट के मामले सुनने के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भारत का कहना है कि मौजूदा विवाद तकनीकी है और इसे न्यूट्रल एक्सपर्ट के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। सिंधु नदी के पानी को लेकर जब भी कोई तकनीकी विवाद होता है, तो उसे सुलझाने के लिए न्यूट्रल (निष्पक्ष) एक्सपर्ट की व्यवस्था की गई है। यह प्रावधान सिंधु जल संधि (IWT) में पहले से तय है। न्यूट्रल एक्सपर्ट कोई अदालत नहीं होता। वह एक स्वतंत्र और तटस्थ तकनीकी विशेषज्ञ होता है, जो पानी से जुड़े तकनीकी सवालों पर राय देता है। न्यूट्रल एक्सपर्ट किन मामलों में दखल देता है? भारत पिछले साल सिंधु जल संधि को स्थगित कर चुका भारत-पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु जल समझौता हुआ था। 22 अप्रैल को जम्मू-कशमीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को स्थगित कर दिया था। सिंधु नदी प्रणाली में कुल 6 नदियां हैं- सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। इनके किनारे का इलाका करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसमें 47% जमीन पाकिस्तान, 39% जमीन भारत, 8% जमीन चीन और 6% जमीन अफगानिस्तान में है। इन सभी देशों के करीब 30 करोड़ लोग इन इलाकों में रहते हैं। 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के पहले से ही भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच नदियों के पानी के बंटवारे का झगड़ा शुरू हो गया था। 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के PM नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच दस्तखत हुए। इसे इंडस वाटर ट्रीटी या सिंधु जल संधि कहा जाता है। सिंधु जल समझौता स्थगित करने से पाकिस्तान पर असर पाकिस्तान में खेती की 90% जमीन यानी 4.7 करोड़ एकड़ एरिया में सिंचाई के लिए पानी सिंधु नदी प्रणाली से मिलता है। पाकिस्तान की नेशनल इनकम में एग्रीकल्चर सेक्टर की हिस्सेदारी 23% है और इससे 68% ग्रामीण पाकिस्तानियों की जीविका चलती है। इसका असर पाकिस्तान में आम लोगों के साथ-साथ बिजली उत्पादन पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक सालाना बिजली उत्पादन में 30% से 50% तक की कमी आ सकती है।
