चीनी वैज्ञानिकों के भरोसे चीन को टक्कर दे रहा अमेरिका:मेटा AI रिसर्च टीम 11 में से 7 रिसर्चर चीन के, 1 भी अमेरिकी नहीं

मेटा CEO मार्क जकरबर्ग ने जून में अपनी नई सुपर इंटेलिजेंस लैब का ऐलान किया था। तब उन्होंने बताया था कि इस प्रोजेक्ट में शामिल 11 वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। इनका मकसद ऐसी मशीनें बनाना है जो इंसानी दिमाग से भी ज्यादा ताकतवर हों। न्यूयॉर्क टाइम्स को मिले इंटरनल मेमो से पता चला है कि ये सभी 11 वैज्ञानिक दूसरे देशों में पढ़े लिखे अप्रवासी हैं। इनमें से 7 वैज्ञानिक चीन से हैं, जबकि बाकी 4 भारत, ब्रिटेन, साउथ अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया से हैं। अखबार ने लिखा है कि अमेरिका में लंबे समय से सरकारी अधिकारियों और एक्सपर्ट का एक वर्ग चीन को AI के क्षेत्र में सबसे बड़ा खतरा बताता रहा है। लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिका में हो रहा बड़ा और क्रांतिकारी AI रिसर्च काफी हद तक चीनी वैज्ञानिकों की मदद से आगे बढ़ाया जा रहा है। चीनी वैज्ञानिकों पर निर्भर अमेरिकी कंपनियां मेटा पहले से ही चीनी वैज्ञानिकों पर काफी निर्भर रही है। कंपनी के भीतर अक्सर मजाक में कहा जाता है कि नए आने वालों को दो चीजें सीखनी पड़ती हैं। पहली हैक, यानी कंपनी की प्रोग्रामिंग भाषा और दूसरी मंदारिन, क्योंकि AI टीमों में बड़ी संख्या में चीनी रिसर्चर्स होते हैं। इस साल मेटा को लगभग 6,300 H-1B वीजा अप्रूव हुए जो अमेजन के बाद सबसे ज्यादा हैं। मेटा ने 2018 के बाद से कम से कम 28 रिसर्च पेपर पर चीनी संगठनों के साथ मिलकर काम किया है। सिर्फ मेटा ही नहीं, बल्कि ऐप्पल, गूगल, इंटेल और सेल्सफोर्स जैसी अमेरिकी कंपनियों ने भी चीनी संगठनों के साथ मिलकर कई अहम रिसर्च किए हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने तो सबसे ज्यादा, यानी कम से कम 92 अहम पेपरों में साझेदारी की है। टॉप-AI वैज्ञानिकों में से एक-तिहाई चीन से अमेरिका में ट्रम्प सरकार के आने के बाद से प्रशासन सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी अपना चुका है। इसके अलावा सिलिकॉन वैली में भी चीन विरोधी भावना बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। इसके बावजूद चीनी रिसर्चर्स न सिर्फ अमेरिका में बने हुए हैं बल्कि अहम रोल भी निभा रहे हैं। पॉलसन इंस्टीट्यूट के 2020 में पब्लिश एक रिसर्च में अनुमान लगाया गया था कि दुनिया की टॉप- AI वैज्ञानिकों में करीब एक-तिहाई चीन से हैं, और इनमें से ज्यादातर अमेरिकी संस्थानों में काम कर रहे हैं। चीनी टैलेंट का सबसे ज्यादा फायदा उठा रही AI इंडस्ट्री कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के नए अध्ययन में पाया गया कि 2019 में अमेरिका की यूनिवर्सिटीज और कंपनियों में काम कर रहे 100 शीर्ष चीनी शोधकर्ताओं में से 87 आज भी वहीं काम कर रहे हैं। यानी ChatGPT के आने से पहले से लेकर AI बूम के दौरान तक वे अमेरिका में टिके हुए हैं। इन रिसर्च से जुड़े मैट शीहान का मानना है कि अमेरिका की AI इंडस्ट्री चीनी टैलेंट का सबसे ज्यादा फायदा उठाता है। चीनी छात्र पढ़ने और काम करने अमेरिका आते हैं और तमाम तरह की चुनौतियों के बावजूद यहीं रह जाते हैं। अमेरिका-चीन ने AI पर सबसे ज्यादा रिसर्च किया अमेरिकी और चीन के बीच कड़े कॉम्पटिशन के बावजूद दोनों का AI पर सहयोग भी जारी है। अल्फाएक्सिव नाम की कंपनी के एक रिसर्च में पता चला कि 2018 के बाद से दोनों देशों ने AI पर मिलकर जितना रिसर्च किया है, उतना कोई और दो देश मिलकर नहीं कर पाए हैं। सिलिकॉन वैली में कई लोगों को डर है कि चीनी नागरिक अमेरिकी कंपनियों की तकनीक और रिसर्च चीन सरकार को दे सकते हैं। कुछ घटनाएं इस डर को बढ़ाती हैं। जैसे 2023 में एक हैकर ने ओपनAI के इंटरनल मैसेजिंग सिस्टम से तकनीकी जानकारी चुरा ली थी। एक्सपर्ट का कहना है कि इन खतरों के बावजूद चीनी शोधकर्ताओं के साथ काम करने के फायदे कहीं ज्यादा बड़े हैं। उनका मानना है कि अगर ट्रम्प प्रशासन चीन से आने वाली प्रतिभाओं पर और सख्ती करता है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान अमेरिकी कंपनियों को ही होगा। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की एक्सपर्ट हेलेन टोनर के मुताबिक, इस तरह की पाबंदियां अमेरिका की AI बढ़त को नुकसान पहुंचा सकती हैं। चीनी रिसर्चर्स के बिना, सिलिकॉन वैली वैश्विक दौड़ में पिछड़ सकती है।

More From Author

300 से ज्यादा हत्या करने वाले नक्सली हिड़मा की ‘लव-स्टोरी’:लेटर लिखकर इजहार,रिजेक्शन मिला, 2 साल बाद राजे ने हामी भरी, नसबंदी कराकर दूल्हा बना

350 करोड़ वॉट्सएप यूजर्स का डेटा खतरे में:PM मोदी ने किसान सम्मान निधि की 21वीं किस्त जारी की; सोना-चांदी के दाम में फिर तेजी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *