एग्जाम के बीच पिता चल बसे, फिर भी 97.67% लाए:हादसे में पापा को खोया, मां की ममता ने संभाला, पढ़िए- 10वीं टॉपर्स की कहानी

यह कहानियां केवल अंकों की नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस की हैं, जिसने मौत और मुसीबत को मात देकर कामयाबी का परचम लहराया है।
कहते हैं कि लोहे को जितना तपाया जाता है, वह उतना ही निखरता है। राजस्थान के इन होनहारों ने इस कहावत को सच कर दिखाया है। बोर्ड एग्जाम की दहलीज पर खड़ी इन प्रतिभाओं के सामने जब दुखों का पहाड़ टूटा, तो एक पल के लिए कदम डगमगाए, लेकिन टूटे नहीं। किसी के सिर से पिता का साया उठ गया, तो किसी के घर पुलिस की आहट ने सुकून छीन लिया। मगर इन चुनौतियों को ढाल बनाकर इन्होंने जो परिणाम दिए, उसने पूरे परिवार और चाहने वालों की आंखों में खुशी के आंसू ला दिए। आज इनकी सफलता राजस्थान के हर उस छात्र के लिए मिसाल है, जो छोटी मुसीबतों से घबरा जाता है। पढ़िए… ऐसे ही होनहारों की कहानी केस-1 पिता की मौत के बाद छोड़ी थी उम्मीद, प्रिंसिपल के हौसले ने बनाया ‘सितारा’
बाड़मेर के गुड़ामालानी स्थित तेजियावास के रहने वाले भावेश गोदारा के लिए 10वीं की बोर्ड परीक्षा खुशियां नहीं, बल्कि जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान लेकर आई। परीक्षा के बीच में ही पिता बाबूलाल गोदारा का हार्ट अटैक से निधन हो गया। घर में मातम था, चीख-पुकार मची थी, लेकिन भावेश की आंखों में पिता का वह सपना तैर रहा था, जिसमें वे उसे एक ‘इंजीनियर’ के रूप में देखना चाहते थे। आधे एग्जाम हुए थे, आधा संसार उजड़ गया
भावेश बताते हैं- हिंदी, अंग्रेजी और सामाजिक विज्ञान के पेपर अच्छे गए थे। अभी गणित, विज्ञान और संस्कृत की अग्निपरीक्षा बाकी थी कि अचानक पिता का साया सिर से उठ गया। भावेश पूरी तरह टूट चुके थे, हिम्मत जवाब दे गई थी। तब उनके स्कूल (आदर्श विद्या मंदिर) के प्रिंसिपल हुकमाराम बैरड़ ढाल बनकर खड़े हुए। उन्होंने भावेश को समझाया कि हार मान लेना पिता को श्रद्धांजलि नहीं होगी, बल्कि उनके सपनों को पूरा करना ही सच्ची विदाई होगी। अंकों में झलकी पिता की उम्मीद, 3 विषयों में 100 में से 100
पिता के संस्कारों और नैतिक मूल्यों को संबल बनाकर भावेश परीक्षा केंद्र पहुंचे। जब रिजल्ट आया तो हर कोई दंग रह गया। भावेश ने 97.67% अंक हासिल किए। खास बात यह रही कि हिंदी, अंग्रेजी और सामाजिक विज्ञान में उन्होंने 100 में से 100 अंक प्राप्त किए। भावेश कहते हैं- पिताजी मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे। उनके जाने के बाद घर में अंधेरा था, लेकिन मैंने तय किया कि उनके सपनों की लौ बुझने नहीं दूंगा। ये नंबर सिर्फ मेरी मेहनत नहीं, उनके प्रति मेरा वादा हैं। मैं इंजीनियर बनकर ही दम लूंगा। केस-2 जालोर की चंद्रिका का ‘मिशन इसरो’
कहते हैं कि समंदर की लहरें कितनी भी ऊंची क्यों न हों, साहसी मल्लाह अपनी कश्ती किनारे लगा ही लेता है। जालोर की चंद्रिका विश्नोई ने इसे सच कर दिखाया है। दसवीं की बोर्ड परीक्षा के दौरान जब घर का माहौल पुलिसिया जांच और पूछताछ के कारण तनावपूर्ण था, तब चंद्रिका ने घबराहट को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लिया। नतीजा- 99% अंक और आंखों में देश की सेवा का बड़ा सपना। 7वीं में लिखी किताब, 10वीं में खुद की अग्निपरीक्षा
चंद्रिका की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने महज 7वीं कक्षा में एक किताब लिखी थी- ‘छू ले अब वो नभ, नभ दूर नहीं’। यह किताब उनकी 10वीं कक्षा में पब्लिश हुई, जिसमें उन्होंने युवाओं को सोशल मीडिया से दूर रहने की प्रेरणा दी थी। लेकिन नियति ने उनकी खुद की परीक्षा लेनी शुरू कर दी। एक पुराने केस के सिलसिले में पुलिस अक्सर उनके पिता से पूछताछ करने घर आती थी, जिससे चंद्रिका काफी विचलित हो जाती थीं। दादा बने ‘कवच’, अलग कमरे में रची सफलता की इबारत
चंद्रिका बताती हैं कि घर में पुलिस की मौजूदगी उन्हें डरा देती थी। ऐसे समय में दादा पाबूराम उनके लिए ढाल बने। उन्होंने चंद्रिका को संभाला और पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने को कहा।
चंद्रिका ने रोजाना 2 से 4 घंटे का कड़ा टाइम टेबल बनाया। खुद को एक अलग कमरे में बंद कर बाहरी शोर से दूरी बनाई। स्कूल के टीचर्स ने भी चंद्रिका के मानसिक संघर्ष को समझा और लगातार मोटिवेट किया। अगला लक्ष्य… इसरो वैज्ञानिक या पायलट
99 प्रतिशत अंक हासिल करने के बाद अब चंद्रिका के पास अपनी लिखी किताब के टाइटल को सच करने का मौका है। वे कहती हैं कि उनका लक्ष्य अब इसरो (ISRO) वैज्ञानिक या पायलट बनकर देश का नाम रोशन करना है।
वो कहती हैं- घर के हालात देख कई बार मन विचलित हुआ, लेकिन दादाजी ने हमेशा कहा कि तुम्हारी कलम ही तुम्हारी असली ताकत है। आज यह परिणाम उन्हीं के भरोसे की जीत है। केस-3
हादसे में पिता को खोया, मां की ममता ने बनाया टॉपर
कहते हैं कि जब पहाड़ जैसी मुसीबत टूटती है, तो इंसान बिखर जाता है, लेकिन हिंडौन सिटी (करौली) की खुशबू शर्मा ने उस मलबे से अपनी कामयाबी की मीनार खड़ी कर दी। 27 नवंबर 2025 की वह तारीख खुशबू के जीवन का सबसे काला दिन था, जब एक हादसे ने उनके पिता एडवोकेट भूपेंद्र शर्मा को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया। घर में कोहराम था, लेकिन खुशबू की आंखों में पिता का वह सपना था, जो उन्हें आसमान छूते देखना चाहते थे। शादी की खुशियां मातम में बदलीं
खुशबू बताती हैं कि दिल्ली में रिश्तेदारी में शादी का समारोह था। वहां एक हादसे में उनके पिता का निधन हो गया। उस समय खुशबू की अर्धवार्षिक परीक्षा चल रही थी। पिता के जाने के बाद खुशबू को लगा कि दुनिया खत्म हो गई है। अब पढ़ाई का क्या मतलब? तब उनकी मां चंद्रमुखी शर्मा उनकी ‘ढाल’ बनीं। मां की सीख… अच्छे नंबर ही पिता को सच्ची श्रद्धांजलि
रोती हुई बेटी को मां ने सीने से लगाया और कहा- बेटा, अगर तुम पढ़-लिखकर बड़े मुकाम पर पहुंचोगी, तो यही तुम्हारे पिता को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। मां के इन शब्दों ने खुशबू के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी। उन्होंने गम को किनारे रख किताबों से दोस्ती कर ली।
खुशबू ने रोज 5 घंटे पढ़ाई करती थीं।सोशल मीडिया और मोबाइल से पूरी तरह दूरी बनाई, जिसका परिणाम सामने है। गणित में 100 में से 100 और संस्कृत में 99 अंक। कुल स्कोर- 99% है। अगला मिशन… IIT और देश की सेवा
99 प्रतिशत अंकों के साथ बोर्ड में परचम लहराने वाली खुशबू अब IIT (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) से इंजीनियरिंग करना चाहती हैं। वे कहती हैं कि उनके पिता हमेशा उन्हें आत्मनिर्भर और सफल देखना चाहते थे। अब उनका हर कदम उसी सपने की ओर बढ़ेगा।
खुशबू कहती हैं- मेरे पिता मेरे हीरो थे। आज जो भी अंक मुझे मिले हैं, वे मेरी मेहनत से ज्यादा मेरे पिता के प्रति मेरा प्यार और सम्मान है। मैं इंजीनियर बनकर अपने परिवार और देश का नाम रोशन करना चाहती हूं। ————- रिजल्ट से जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… 10वीं में जुड़वा बहनों के 98% नंबर आए:सब्जी बेचने वाले की बेटी के 98.67 प्रतिशत; कोटा में परिणाम देख डांस करने लगे स्टूडेंट राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) की ओर से मंगलवार को 10वीं का रिजल्ट जारी कर दिया गया। इस बार परिणाम 94.23 प्रतिशत रहा है। यह पिछले साल से 1.17 प्रतिशत ज्यादा है। पूरी खबर पढ़िए

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