ईरान जंग में ट्रम्प के 5 मकसद कितने कामयाब:पहले ही दिन खामेनेई की हत्या, मिसाइल इंडस्ट्री तबाह, लेकिन परमाणु खतरा नहीं टला

अमेरिका और इजराइल ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था। इसके कुछ ही देर बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक 8 मिनट का वीडियो जारी करके इस जंग के कुछ टारगेट बताए थे। उन्होंने कहा था कि उनका मकसद अमेरिकी लोगों की रक्षा करना है और ईरान से आने वाले खतरों को खत्म करना है। अब उन्हीं टारगेट्स के मुताबिक समझते हैं कि अमेरिका को जंग में अब तक कितनी कामयाबी मिली है। क्या हासिल हुआ है और क्या अब भी अधूरा रह गया है। 1. मिसाइल और हथियार इंडस्ट्री खत्म करना अमेरिका और इजराइल का अहम कमसद था कि ईरान की मिसाइल ताकत को कमजोर कर दिया जाए, ताकि वह दूर तक हमला न कर सके। इसके लिए दोनों देशों ने बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च करने वाले ठिकाने (लॉन्चर), मिसाइल बनाने वाली फैक्ट्रियां, मिसाइल स्टोर करने के गोदाम और कमांड और कंट्रोल सेंटर पर हमले किए। इन हमलों से ईरान की मिसाइल क्षमता को काफी नुकसान हुआ है। कई लॉन्चर और फैक्ट्रियां नष्ट हो चुकी हैं, जिससे उसकी नई मिसाइल बनाने की रफ्तार धीमी पड़ी है। लेकिन अभी भी ईरान के पास काफी मिसाइलें बची हुई हैं और वह हमले कर रहा है। साथ ही, वह ड्रोन का भी इस्तेमाल कर रहा है। ईरान ने अपनी मिसाइलें अलग-अलग जगहों पर छिपाकर रखी हैं। कई ठिकाने जमीन के नीचे (अंडरग्राउंड) बने हैं, जिन्हें पूरी तरह नष्ट करना मुश्किल है। कुछ मोबाइल लॉन्चर होते हैं, जिन्हें जल्दी-जल्दी जगह बदलकर इस्तेमाल किया जा सकता है। ईरान अब सिर्फ मिसाइलों पर निर्भर नहीं है, बल्कि बड़ी संख्या में ड्रोन (मानवरहित विमान) का भी इस्तेमाल कर रहा है। 2. नौसेना को खत्म करना अमेरिका और इजराइल का टारगेट था कि ईरान की नौसेना को कमजोर या लगभग खत्म कर दिया जाए, ताकि वह समुद्र के रास्ते कोई बड़ा हमला या बाधा न डाल सके। इसके लिए युद्धपोत, पनडुब्बियां, नौसैनिक ठिकाने और बंदरगाह और हथियार और मिसाइल ले जाने वाले जहाजों को निशाना बनाया गया। मार्च की शुरुआत में अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो दागकर श्रीलंका के पास मौजूद ईरानी वॉरशिप IRIS देना को डुबो दिया। इस जहाज पर करीब 180 लोग सवार थे। शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम 80 लोगों की मौत हुई। यह हमला इसलिए अहम था क्योंकि यह जहाज लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम था और हाल ही में भारत के साथ एक नौसैनिक अभ्यास में भी शामिल हुआ था। इन हमलों से ईरान के कई बड़े जहाज और संसाधन नष्ट हो गए। समुद्र में उसकी ताकत पहले से कमजोर हो गई। लंबी दूरी पर ऑपरेशन करने की क्षमता घट गई। हालांकि वह अभी भी समुद्र में खतरा पैदा करने की क्षमता रखता है। ईरान के पास छोटी-छोटी तेज नावें (स्पीड बोट्स) हैं, जिनका इस्तेमाल वह अब भी कर सकता है। वह समुद्र में बारूदी सुरंग (माइन) बिछाने जैसी रणनीति अपना सकता है जो होर्मुज जैसे संकरे समुद्री रास्तों में छोटी ताकत भी बड़ा असर डाल सकती है। 3. ईरान समर्थित मिलिशिया को कमजोर करना अमेरिका और इजराइल चाहते थे कि ईरान जिन हथियारबंद ग्रुप्स को समर्थन देता है, उन्हें कमजोर कर दिया जाए। ये ग्रुप्स अलग-अलग देशों में ईरान के लिए काम करते हैं और जरूरत पड़ने पर हमले भी करते हैं। इसलिए इन्हें ‘प्रॉक्सी’ ताकत कहा जाता है। जंग के दौरान इन्हें निशाना बनाया गया। इजराइल ने खास तौर पर लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर कई हमले किए। कई कमांडरों और लड़ाकों को भी मार गिराया गया। इससे इनकी ताकत पर असर पड़ा है, लेकिन यह असर पूरी तरह खत्म करने वाला नहीं रहा। असल समस्या यह है कि ये मिलिशिया किसी एक देश या एक जगह तक सीमित नहीं हैं। इराक, लेबनान, सीरिया और यमन जैसे अलग-अलग इलाकों में इनके नेटवर्क फैले हुए हैं। इनके पास स्थानीय सपोर्ट भी होता है और अपनी अलग व्यवस्था भी होती है। ऊपर से ईरान इनकी मदद करता रहता है, जिससे ये जल्दी फिर से संभल जाते हैं। इसी वजह से, हमलों के बावजूद ये पूरी तरह खत्म नहीं हुए। इराक में अब भी कुछ गुट अमेरिकी ठिकानों पर रॉकेट हमले कर रहे हैं। हिज्बुल्लाह पर लगातार हमले हुए हैं, लेकिन वह अभी भी एक मजबूत ताकत बना हुआ है और पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 4. ईरान को परमाणु हथियार से रोकना अमेरिका का सबसे बड़ा मकसद यह था कि ईरान किसी भी हालत में परमाणु हथियार न बना सके। ट्रम्प बार-बार कह चुके हैं कि ईरान के पास कभी परमाणु बम नहीं होना चाहिए। अमेरिका ने पिछले साल ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर हमले किए, जिससे उन्हें भारी नुकसान हुआ। फिर भी अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि कुछ समृद्ध यूरेनियम अब भी जमीन के अंदर सुरंगों में मौजूद है। यह यूरेनियम जमीन के नीचे गहरी सुरंगों या बंकर जैसे ठिकानों में छिपा हो सकता है, जहां तक हवाई हमलों का असर पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। अगर इन्हें पूरी तरह नष्ट करना हो, तो जमीन पर सेना भेजनी पड़ सकती है, जो बेहद जोखिम भरा कदम होगा और जंग को और बड़ा बना सकता है। 5. ईरान में सत्ता परिवर्तन ट्रम्प ने ईरान की जनता से सरकार के खिलाफ उठने की अपील भी की थी। लेकिन अभी तक ऐसा कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं हुआ है। हालांकि ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने रेजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन कर दिया है, क्योंकि हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई बड़े अधिकारी मारे गए। लेकिन जमीन पर अलग स्थिति दिखाई देती है। अब नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई बने हैं, जो सख्त रुख वाले माने जाते हैं और सेना के ताकतवर हिस्से के करीब हैं। कुल मिलाकर, ईरान की सरकार अभी भी पहले जैसी ही है। ईरान की सरकार अब भी धार्मिक और कड़े नियंत्रण वाली है, और अमेरिका के खिलाफ उसका रुख भी पहले जैसा ही है। ——————————— ईरान जंग से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका ने ईरान पर 850 टॉमहॉक मिसाइलें दागीं:2 साल में बनता है 34 करोड़ का यह हथियार, जंग खिंची तो स्टॉक खत्म होने की आशंका ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका ने बड़े पैमाने पर टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया। इसे अमेरिकी हथियारों के जखीरे का अहम हथियार माना जाता है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक चार हफ्तों में 850 से ज्यादा मिसाइलें दागी गईं। अनुमान है कि अमेरिकी नौसेना के पास लगभग 4,000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं। अगर यह सही है तो टॉमहॉक मिसाइलों का करीब एक चौथाई हिस्सा खत्म हो चुका है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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